Wednesday, 22 April 2020

लॉकडाउन अवधि में, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी कोर्ट की सुनवाई

दुर्ग, वर्तमान में कोरोना वायरस के संकट को देखते हुए लॉकडाउन घोषित किया गया है, माननीय उच्च न्यायालय द्वारा इस अवधि में प्रकरणों की सुनवाई स्थगित रखी गई है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में एक मार्गदर्शिका जारी की गई है। जिसके अनुसार, लॉकडाउन अवधि में न्यायालय के बंद रहने के बावजूद अत्यधिक आवश्यक कार्यों का निष्पादन एवं प्रकरणों की सुनवाई  जिला न्यायालयों में होगी जिसकी जानकारी मार्गदर्शिका में उल्लिखित है। आवश्यक प्रकरणों की सुनवाई में जमानत आवेदन, जमानत पर अपील आदि प्रकरणों की सुनवाई हेतु आवेदन ईमेल के माध्यम से स्वीकृत किए जाएंगे। ऐसे आवेदनों पर सुनवाई वर्चुअल अर्थात वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की जा सकेगी। यह सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग कमेटी के द्वारा स्वीकृत वीडियो ऐप के माध्यम से हो सकेगी। इसके लिए अधिवक्ता एवं शासकीय अधिवक्ता को अपने लैपटॉप या टैब में वीडियो मोबाइल वीडियो ऐप इंस्टॉल करना होगा।
ई-मेल से आवेदन प्राप्त होने पर न्यायालय, सुनवाई की तिथि व समय निर्धारित करेगी। निर्धारित समय से 10 मिनट पूर्व, अधिवक्ता को  एक लिंक प्रेषित की जावेगी, जिसको क्लिक कर लॉगइन होना होगा। न्यायालय के शासकीय अधिवक्ता तथा अधिवक्ता इस वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल कोर्ट में उपस्थित हो सकेंगे। उपस्थिति के समय ड्रेस कोड का पालन करना आवश्यक होगा। यह विशेष तौर पर निर्देश दिया गया है कि न्यायालयीन प्रक्रिया के ऐसे किसी भी वीडियो कांफ्रेंसिंग कार्यवाही की रिकॉर्डिंग नहीं की जावेगी या सेव नहीं किया जावेगा।
ईमेल के माध्यम प्रस्तुत आवेदन के साथ अधिवक्ता का स्टेट बार का अधिवक्ता कोड उनका मोबाइल नंबर तथा ईमेल आईडी एवं परिचय पत्र की स्कैन कॉपी भी मेल में प्रेषित किया जाना आवश्यक होगा।
समय का विशेष ध्यान रखना होगा अन्यथा सुनवाई नहीं हो पाएगी! किसी भी प्रकार के तकनीकी अवरोध के कारण यदि सुनवाई संभव नहीं हुई तो इसकी किसी प्रकार की जिम्मेदारी न्यायालय नहीं लेगी।
आवेदन पत्र जिला न्यायालय दुर्ग के ईमेल आईडी durg.court@gov.in मे प्रेषित किया जाना अपेक्षित है। वीडियो कांफ्रेंसिंग हेतु, सुनवाई समय के पूर्व ही अपने लैपटॉप या डेक्सटॉप पर या टैब पर Vidyo desktop/ vidyo mobile इंस्टॉल करना है।  (एप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं - Vidyo)  न्यायालय द्वारा निर्धारित समय के पूर्व लिंक को क्लिक कर वीडियो कांफ्रेंसिंग में जुड़ना है। यहां सामान्य न्यायालय की तरह आपकी बातें सुनी जा सकेंगी तथा माननीय न्यायालय आदेश पारित कर सकेंगे।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश दुर्ग श्री गोविंद कुमार मिश्रा के निर्देशन में जिला न्यायालय कंप्यूटराइजेशन कमेटी के चेयरमैन श्री हरीश अवस्थी के द्वारा इसकी व्‍यवस्‍था की जा रही है।

Tuesday, 7 April 2020

झूठे समाचार तेजी से फैलते हैं और यह इस वायरस की तुलना में अधिक खतरनाक है

epidemic infodemic
सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया था कि फर्जी खबरों से पैदा हुई घबराहट ने मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन को बढ़ावा दिया और लाखों मजदूर सड़कों में आ गए थे। आप स्‍वयं जानते हैं कि न्‍यायालय में दायर इस याचिका के सुनवाई के दौरान देश में कोरोना के समाचारों से चारो-ओर भय व्‍याप्‍त हो गया था और अफरातफरी का माहौल बन गया था।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय नें इस पर सुनवाई करते हुए यह कहा कि विशेष रूप से, हम मीडिया (प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक) से अपेक्षा करते हैं कि वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की मजबूत भावना को बनाए रखे और सुनिश्चित करे कि घबराहट पैदा करने में सक्षम असत्यापित समाचार प्रसारित न करे। सरकार संदेह को दूर करने के लिए इस संबंध में दैनिक बुलेटिन जारी  करे। हम महामारी के बारे में स्वतंत्र चर्चा में हस्तक्षेप करने का इरादा नहीं रखते हैं, लेकिन मीडिया को निर्देशित करें कि वे घटनाक्रम के बारे में आधिकारिक संस्करण ही प्रकाशित करें। यह अदालत एक निर्देश जारी करती है कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक / प्रिंट मीडिया / वेब पोर्टल या सोशल मीडिया पता लगाए बिना कुछ भी प्रिंट / प्रकाशित या प्रसारित नहीं करेगा।
सर्वोच्‍च न्‍यायालय नें अपने आदेश में विशेष रूप से विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के उस कथन का उल्‍लेख किया जिसमें अफवाहों के संचरण की चिंता है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन नें कहा है कि हम सिर्फ एक महामारी से नहीं लड़ रहे हैं; हम एक दानवी सूचना (infodemic) से भी लड़ रहे हैं। झूठे समाचार तेजी से फैलते हैं और यह इस वायरस की तुलना में अधिक खतरनाक है।
साथियों कोरोना महामारी से लड़ते इस देश में अफवाहों को रोकने के लिए यह आदेश प्रसारित हुआ है ना कि कोरोना शब्‍द को बेन किया गया है। यदि आपके पास सरकार द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी है, यदि आप कोरोना से संबंधित सकारात्‍मक संदेश देना चाहते हैं, कोरोना से लड़ते कोरोना वारियर्स की सच्‍ची कहानी बताना चाहते हैं तो आपको पुलिस क्‍यों पकड़ेगी।

- संजीव तिवारी 
मो. 9926615707

Saturday, 7 December 2019

आनंद मठ मंदिर समिति कौही एवं अन्‍य विरूद्ध ढालेन्द्र राम गजेन्द्र एवं अन्‍य


न्यायालयः-नवम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दुर्ग , जिला-दुर्ग  (छ.ग.)
(पीठासीन अधिकारीः-कु. स्मिता रत्नावत)
व्यवहार वाद क्रमांकः-69ए/2016
संस्थित दिनाँकः-21.06.2016
1. आनंद मठ मंदिर समिति, कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
द्वाराः-उपाध्यक्ष-
कौशल तिवारी पिता स्व. श्री पुरेन्द्र नाथ तिवारी,
उम्र-लगभग 55 वर्ष, निवासीः-ग्राम-कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
2. राजेश उर्फ हुलेश्वर प्रसाद तिवारी
पिता स्व. श्री अशोक तिवारी, उम्र लगभग 50 वर्ष
3. केदार प्रसाद तिवारी पिता स्व. श्री चुरामन प्रसाद तिवारी,
उम्र-लगभग 66 वर्ष
(मृत/विलोपित आदेश पत्रिका दिनाँकितः-27.01.2017)
4. शिव कुमार पाण्डेय पिता स्व. श्री प्रहलाद पाण्डेय,
उम्र-लगभग 50 वर्ष
5. मन्नूलाल टिकरिहा पिता स्व. श्री डोमार सिंह टिकरिहा,
उम्र-लगभग 52 वर्ष,
निवासी उपरोक्त सभीः-ग्राम-कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)                                                                        वादीगण
-:विरूद्धः-
1. ढालेन्द्र राम गजेन्द्र पिता स्व. श्री भुवन लाल गजेन्द्र,
उम्र-लगभग 50 वर्ष, निवासीः-क्वार्टर नम्‍बरर-13,
गुरूकृपा सदन, पाईप फैक्ट्री रोड, न्यू शांति नगर,
रायपुर, तहसील एवं जिला-रायपुर (छ.ग.)
2. रमेश मोदी पिता स्व. श्री छगन लाल मोदी,
प्रांताध्यक्ष, छत्तीसगढ़ विश्व हिन्दू परिषद,
कार्यालय पताः-सत्य नारायण भवन, काली नगर,
रायपुर, तहसील एवं जिला-रायपुर (छ.ग.)
3. छत्तीसगढ़ शासन,
द्वाराः-जिला मजिस्ट्रेट दुर्ग,
जिला-दुर्ग (छ.ग.)
4. आम जनता                                                                                                 प्रतिवादीगण

वादीगण द्वारा श्री हरेकृष्ण तिवारी अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा श्री राज कुमार रस्तोगी अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 3 द्वारा श्री विजय कसार अतिरिक्त शासकीय अभिभाषक।
प्रतिवादी क्रमांक 4 एकपक्षीय (दिनाँकः-05.12.2017)।
-ःनिर्णयः-
(आज दिनाँक 15 नवम्बर 2019 का घोषित)

1- वादीगण द्वारा यह वाद प्रतिवादीगण के विरूद्ध वादग्रस्त भूमि-

ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग के संबंध में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 को शून्य घोषित कर, वादग्रस्त संपत्ति में प्रतिवादीगण को हस्तक्षेप किये जाने से निषेधित करने हेतु स्थायी निषेधाज्ञा बाबत् संस्थित किया गया है।

वाद में उभयपक्ष के मध्य स्वीकृत तथ्य निम्नवत है- 
2- वर्ष 2013 में ग्राम कौही स्थित वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में वादी क्रमांक 1 समिति एवं ग्रामवासियों द्वारा दिनाँक 29.01.2013 को वादग्रस्त संपत्ति को ट्रस्ट समिति घोषित किये जाने हेतु आवेदन पत्र मुख्यम ंत्री, छत्तीसगढ़ राज्य, रायपुर को दिया गया था। आवेदन के परिप्रेक्ष्य में वादग्रस्त संपत्ति को ट्रस्ट बनाये जाने की कार्यवाही प्रारंभ कर, राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014-15 पंजीबद्ध कर, प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा आपत्ति दिनाँक 03.08.2015 प्रस्तुत किये जाने पर अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग द्वारा दिनाँक 17.08.2015 को आदेश पारित कर, ट्रस्ट बनाये जाने बाबत् प्रस्तुत आवेदन निरस्त कर दिया गया।

वादीगण का वाद संक्षेप में इस प्रकार है किः-
3- वादग्रस्त संपत्ति कृषि भूमि होने से, प्रतिवादी क्रमांक 3 के रूप में छत्तीसगढ़ शासन को पक्षकार बनाया गया है। वादीगण को प्रतिवादी क्रमांक 3 से कोई अनुतोष प्राप्त नहीं किया जाना है। वादग्रस्त संपत्ति कृषि सिलिंग सीमा अधिनियम से प्रभावित नहीं होती है। कौशल प्रसाद तिवादी एवं वादी क्रमांक 2 राजेश उर्फ कुलेश्वर प्रसाद तिवारी के पूर्वज ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला- दुर्ग के मालगुजार थे।

-:ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) स्थित वादग्रस्त संपत्ति का विस्तृत विवरणः-
-:तालिका-1:-

क्रमांक वादग्रस्त भूमि खसरा नम्‍बर रकबा कुल रकबा
1 श्री हनुमान सीर भूमि 50 1.10 एकड़ 6.37 एकड़ 425 2.80 एकड़ 429 2.47 एकड़
2 श्री महाकाली देवी सीर भूमि 430 0.83 एकड़ 1.59 एकड़ 445 0.76 एकड़
3 श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर 344 1.95 एकड़ 18.40 एकड़ 426 11.46 एकड़ 431 3.94 एकड़ 457 1.05 एकड़
कुल भूमि 26.327 26.327

उक्तानुसार तालिका-1 में उल्लेखित वादग्रस्त संपत्ति रामप्रसाद एवं उनके पूर्वजों द्वारा उक्त तालिका में उल्लेखित मंदिर को दी गई। वादग्रस्त संपत्ति की आय से, मंदिर को प्रदत्त किये जाने की दिनाँक से, मंदिर की देखरेख भोगराग आदि की व्यवस्था होते चली आ रही है। भक्तगण भगवान हनुमान जी, महाकाली जी पर श्रद्धा एवं आस्था रखने के कारण दर्शन हेतु आते हैं एवं अपनी इच्छानुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं। मालगुजारी के समय से ही वादग्रस्त संपत्ति सार्वजनिक मंदिर रहे हैं एवं तालिका 1 में उल्लेखित मंदिरों के सर्वराकार बिहारीलाल पिता श्री भगवान तिवारी ब्राम्हण थे। वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख हेतु ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग एवं आसपास के ग्राम के व्यक्तियों ने मिलकर, एक अपंजीकृत संस्था आनंद मठ मंदिर समिति, कौही का गठन किया। आनंद मठ मंदिर समिति विगत् 30 से 35 वर्षों से कार्य करते हुये, मंदिर एवं उसकी कृषि संपत्ति की देखरेख करते आ रही है। तालिका 1 में उल्लेखित संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज करवा लिया गया। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा बतौर सर्वराकार कभी भी वादग्रस्त संपत्ति पर आधिपत्य नहीं रखा गया, न ही वादी क्रमांक 1 समिति के देखरेख एवं व्यवस्था में किसी भी प्रकार से कोई हस्तक्षेप किया। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता सर्वराकार स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र की मृत्यु के उपरांत प्रतिवादी क्रमांक 1 ने वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में बिना किसी हक व अधिकार के बतौर सर्वराकार अपना नाम, अपने पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र के स्थान पर दर्ज करवा लिया।
इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 का वादग्रस्त संपत्ति पर किसी भी प्रकार का कोई हक, अधिकार एवं हस्तक्षेप नहीं था। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा ही वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था की जा रही थी एवं वर्तमान में भी निर्विध्न रूप से की जा रही है। ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग में स्थित हनुमान मंदिर, महाकाली मंदिर, जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा मंदिर, शिव मंदिर, विष्णु मंदिर, गायत्री मंदिर, कर्मा माता मंदिर, बूढ़ादेव मंदिर, संतोषी माता मंदिर, राम मंदिर, परमेश्वरी मंदिर, राधाकिशन मंदिर, शनि मंदिर, चंडी मंदिर, भैरोबाबा मंदिर, राजीव लोचन मंदिर, एकादशी मंदिर, नारायण देव मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, रामदरबार मंदिर आदि, बावड़ी सामुदायिक भवन, कला मंच, समरसता भवन, शासकीय भूमि खसरा नम्‍बरर 1147, 1148, 1149, 1150 रकबा क्रमशः 2.97, 0.18, 0. 17, 0.18 हेक्टेयर पर स्थित है। वादग्रस्त संपत्ति छ.ग. पर्यटन विभाग से संबंधित है। सभी मंदिर सार्वजनिक मंदिर होने से, आम जन से दर्शन एवं चढ़ावे में किसी भी प्रकार की रोकटोक नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति पर वर्ष में 2 बार अर्थात् नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि में धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। दोनों नवरात्रि में आम जन के आर्थिक सहयोग से 350 से 400 जोत प्रज्जवलित की जाती है। मंदिर के चढ़ावे, जोत की सहयोग राशि, आर्थिक जन सहयोग एवं शासकीय सहयोग से मंदिरों का विकास एवं मेले का आयोजन किया जाता है। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा विगत् 2 वर्ष पूर्व तक तथाकथित सर्वराकार रहते हुये, कृषि की आमदनी का उपयोग किया जाता था। प्रतिवादी क्रमांक 1 आमदनी का कोई हिसाब नहीं देते एवं न ही मंदिर की देखरेख एवं व्यवस्था में कोई सहयोग करते थे। आनंद मठ समिति वादी क्रमांक 1 की दिनाँक 17.01.2016 को आयोजित बैठक में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 की उपस्थिति में वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में पब्लिक ट्रस्ट बनाने पर चर्चा के दौरान प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा सहमति दी गई। वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेख में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम बतौर सर्वराकार दर्ज था। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की किसी भी प्रकार की कोई देखरेख एवं व्यवस्था नहीं की जाती थी। वादी क्रमांक 1 समिति ही वादग्रस्त संपत्ति की समस्त देखरेख एवं व्यवस्था करती थी। वर्तमान में वादी क्रमांक 1 समिति ही वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था कर रही है। अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग के न्यायालय में दर्ज राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113 वर्ष 2014-15 की आदेश पत्रिका दिनाँकित 17.11.2014 से 23.02.2015 तक में पक्षकारों को आहूत किये जाने हेतु आदेशित किये जाने के पश्चात् प्रकरण में दिनाँक 25.02.2015 की कार्यवाही के पश्चात् 17. 08.2015 को प्रकरण सुनवाई में लेकर, प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन कर, राजस्व प्रकरण अपास्त कर दिया गया है।
ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से वैधानिक आवश्यकता के बिना व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08. 02.2016 निष्पादित कर, वादग्रस्त संपत्ति की कीमत रू0 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) आंकलित कर, विश्व हिन्दू परिषद संस्था के छत्तीसगढ़ राज्य के प्रांत अध्यक्ष/प्रदेश अध्यक्ष रमेश मोदी प्रतिवादी क्रमांक 2 को पदेन अध्यक्षता में वादग्रस्त संपत्ति हस्तांतरित कर दी गई। प्रतिवादी क्रमांक 1 को पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 की आड  में वादग्रस्त संपत्ति को हस्तांतरित करने का कोई अधिकार नहीं था। वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति नहीं थी, न ही वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 के पूर्वजों द्वारा मंदिरों को दान में दी गई। वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन मालगुजार की भूमि होने से, तात्कालिन मालगुजार द्वारा मंदिर को दान में दी गई थी। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग को दिनाँक 03.08.2015 को राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113 वर्ष 2014-15 में वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी मंदिर एवं निजी न्यास की संपत्ति होने की मिथ्या सूचना दी गई। वादी क्रमांक 1 समिति की गठन के दिनाँक से वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था विगत् 40 वर्षों से वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा की जा रही है। प्रतिवादी क्रमांक 2 द्वारा पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 की आड़ में वादी क्रमांक 1 समिति के वादग्रस्त संपत्ति के कार्या ें एवं व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अवैध प्रयास किया जा रहा है। प्रतिवादी क्रमांक 2 द्वारा पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के आधार पर वादग्रस्त संपत्ति पर बतौर सर्वराकार स्वयं का नाम नामांतरित किये जाने हेतु आवेदन पत्र तहसीलदार पाटन, जिला-दुर्ग के न्यायालय में दिये जाने पर, नायब तहसीलदार दुर्ग द्वारा प्रस्तुत आवेदन की सुनवाई कर, दिनाँक 12.04.2016 को आगामी सुनवाई दिनाँक 29.04.2016 के लिये ईश्तहार प्रकाशन एवं मुनादी करवाये जाने पर, वादी क्रमांक 1 समिति के सदस्यों को व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के निष्पादन की जानकारी होने से, यह वाद संस्थित किये जाने का वाद कारण प्राप्त हुआ। वादीगण द्वारा संस्थित वाद पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 को शून्य घोषित किये जाने हेतु व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के मूल्य रू. 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) एवं वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से प्रतिवादी क्रमांक 2 को स्थायी रूप से निषेधित किये जाने हेतु रू0 5,000/- (पाँच हजार रूपये) का मूल्य प्राक्कलित कर, क्रमशः रू. 500/-, रू0 500/- कुल रू0 1,000/- का न्याय शुल्क चस्पा किया गया है।

4- प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा जवाबदावा प्रस्तुत कर, वादीगण के अभिवचनों को अस्वीकार कर, अभिकथन किया गया है कि प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था सर्वराकार की हैसियत से स्वयं की जाती है। प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में बतौर सर्वराकार दर्ज है। प्रतिवादी क्रमांक 1 का वादग्रस्त संपत्ति पर अनन्य आधिपत्य है। पूर्व में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता द्वारा एक मंदिर समिति का अस्थायी गठन किया गया था। समिति के अस्थायी गठन का उद्देश्य समय-समय पर ग्राम कौही में लगने वाले मेले एवं मंदिर में प्रसाद का सुचारू वितरण करना था। मंदिर समिति का कभी वादग्रस्त संपत्ति पर किसी भी प्रकार का हक, अधिकार व हस्तक्षेप नहीं रहा है। वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता, तत्पश्चात् स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 का हक एवं कब्जा वर्ष 1957 से चला आ रहा है। मंदिर समिति का कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं है। आनंद मठ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष की हैसियत से श्री कौशल तिवारी वादग्रस्त संपत्ति में कोई वैधानिक हक नहीं रखने के कारण वाद संस्थित करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित होने वाले पूजा कार्यक्रम एवं मेला एवं उत्सव के प्रबंधन के लिये सर्वराकार द्वारा समय-समय पर अस्थायी समिति का गठन किया जाता रहा है। ऐसी ही एक समिति का गठन दिनाँक 01.06.2016 को प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा किया गया था, जिसमें वादीगण को शामिल नहीं किया गया था। वादीगण द्वारा दुर्भावनापूर्वक प्रतिवादीगण को परशान करने की गरज से मिथ्या वाद संस्थित किया गया है, जो खारिज किये जाने योग्य है। वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख पूर्व सर्वराकार बिहारीलाल ब्राम्हण द्वारा की जाती थी। तत्पश्चात् प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता का नाम वर्ष 1957 में वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा सर्वराकार के रूप में वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर में स्थापित देवी-देवता की पूजा, भोग आदि का प्रबंधन किया जाने लगा। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र की मृत्यु उपरांत प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम विरासतन हक में दिनाँक 27.01.2012 को राजस्व अभिलेखों में नामांतरित किया गया। सर्वराकार द्वारा वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि की देखरेख एवं व्यवस्था की जाती थी। दिनाँक 27.09.2012 के पश्चात् से प्रतिवादी क्रमांक 1 वादग्रस्त संपत्ति के आधिपत्य में होकर, वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं प्रबंधन का निर्विध्न रूप से बतौर सर्वराकार कार्य कर रहे हैं।

वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज को विक्रय कर, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित रानीतराई, जिला-दुर्ग के बचत खाता क्रमांक 61034000691 में वर्ष 2013 तक गलत ढंग से राशि जमा होते आ रही थी। कृषि आय को वादियों द्वारा आहरण कर अनुचित उपयोग कर लिया जाता था। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा राजस्व अभिलेखों में स्वयं के नाम से भूमि दर्ज नहीं होने के बावजूद अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके वर्ष 2013 तक मंदिर के कृषि भूमि की उपज की राशि खाते में जमा करा ली जाती थी। गलत प्रक्रिया को सुधारते हुये, सहकारी समिति द्वारा आदेशित करने पर वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिल ेखों में दर्ज सर्वराकार के नाम पर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रानीतराई, जिला-दुर्ग में दिनाँक 13.10.2014 को बैंक खाता 101001566252 खोला गया, जिसमें दिनाँक 30.12.2014 से 30.01.2017 तक वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि के उपज की राशि जमा हुई। वादीगण द्वारा वर्ष 1983 से 2013 तक वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि की उपज की आय को स्वयं प्राप्त कर, हिसाब किताब बार-बार मांगे जाने पर भी नहीं दिया जाता था। वादीगण का उक्त आय का व्यक्तिगत् उपयोग किये जाने के कारण खाते में मात्र 12,363/- रूपये शेष है। वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज की आय एवं चढ़ावे का इस कदर दुरूपयोग किया जा रहा था कि दिनाँक 01.06.2016 को प्रस्ताव पारित कर, वादीगण को मंदिर का पैसा वापस किये जाने हेतु कहा गया है। अस्थायी समिति द्वारा दिनाँक 27.07.2016 को अनुविभागीय अधिकारी एवं दिनाँक 15.06. 2017 को तहसीलदार को पत्र लिखकर, वादीगण से मंदिर मद की शेष राशि जमा करवाये जाने हेतु कहा गया था। वादीगण द्वारा मंदिर के धन का दुरूपयोग किया जाता था। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं प्रबंधन बतौर सर्वराकार आज भी किया जा रहा है। प्रतिवादी क्रमांक 1 वैधानिक प्रक्रिया के तहत् वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था कर रहे हैं। व्यवस्था पत्र के निष्पादन के लिये भारतीय मुद्रांक शुल्क एवं पंजीकरण अधिनियम के तहत् उक्त मुद्रांकन शुल्क अदा करने के उद्देश्य से वादग्रस्त संपत्ति का मूल्यांकन रू0 1,25,51,280/- बाजार मूल्य कर, मुद्रांक एवं पंजीकरण शुल्क भुगतान किया गया है। व्यवस्था पत्र के निष्पादन में किसी भी प्रकार का मौद्रिक लेनदेन नहीं हुआ है। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की उचित देखभाल के उद्देश्य से व्यवस्था पत्र का निष्पादन छग. विश्व हिन्दू परिषद/प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित किया गया है। प्रतिवादी क्रमांक 1 वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार होने के नाते वैधानिक रूप से अंतरण कर सकता है। व्यवस्था पत्र के निष्पादन से वादग्रस्त संपत्ति के स्वरूप एवं प्रकृति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं हो रहा है। व्यवस्था पत्र से वादग्रस्त संपत्ति को विक्रय या अंतरित करने का प्रयास नहीं किया गया है। प्रतिवादीगण के विरूद्ध किसी भी प्रकार की निषेधाज्ञा या आज्ञप्ति पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर 1957 में नामांतरित हुआ। ऐसी स्थिति में वाद समय सीमा बाधित है। वादीगण द्वारा अपने वाद का उचित मूल्यांकन न कर, पर्याप्त न्याय शुल्क अदा नहीं किया गया है। वादीगण द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति में वाद प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है।

5- प्रतिवादी क्रमांक 3 द्वारा जवाबदावा प्रस्तुत कर, वादीगण के अभिवचनों को अस्वीकार कर, अभिकथन किया गया है कि आनंद मठ नाम की कोई पंजीकृत संस्था नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति का संचालन ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग के आसपास की गाँवों द्वारा किया जाता रहा है। वादग्रस्त संपत्ति सर्वप्रथम बिहारीलाल ब्राम्हण के नाम पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी। उपरोक्त भूमि को मोहनानंद द्वारा मंदिरों को दान किया गया था। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री सतनाथ का नाम अधिकार अभिलेख पंजी में वर्ष 1954-55 के अनुसार दर्ज है। स्व. श्री भुवनलाल की मृत्यु के उपरांत वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार के रूप में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम दर्ज हुआ। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 निष्पादित किया गया है। सर्वराकार के नामांतरण हेतु नायब तहसीलदार पाटन के न्यायालय में दिया गया आवेदन राजस्व प्रकरण क्रमांक 33अ/2006, वर्ष 2015-16 दिनाँकित 24.05.2016 के अनुसार नामांतरण आवेदन निरस्त कर दिया गया है।

6- उभयपक्ष के अभिवचनों के आधार पर, पूर्व पीठासीन अधिकारी द्वारा निम्नलिखित वाद-प्रश्न दिनाँकः-21.04.2017 को विरचित किये गये। समक्ष निष्कर्ष लेखबद्ध किये गयेः- 

(क्रमांक/वाद-प्रश्न/निष्कर्ष
01. क्या वादी समिति द्वारा विगत् 30-35 वर्षों से श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) की संपत्तियों का देखरेख व व्यवस्था किया जाता रहा है? ‘हाँ‘
02. क्या आनंद मठ मंदिर समिति का वैधानिक अस्तित्व नहीं होने से, उसे वाद प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है? ‘हितबद्ध व्यक्ति की हैसियत से वाद संस्थित का अधिकार‘
03. क्या श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) एवं उनकी संपत्तियाँ प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति है? ‘प्रमाणित नहीं‘।
04. क्या प्रतिवादी क्रमांक 1 को श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर के सर्वराकार की हैसियत से उक्त मंदिरों के देखरेख व व्यवस्था के संबंध में प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र निष्पादित करने का अधिकार है? ‘हाँ‘।
05. क्या वादीगण प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँक 08.02.2016 को अवैध व शून्य घोषित करने के अनुतोष प्राप्त करने के अधिकारी हैं? ‘नहीं‘
06. क्या वादीगण प्रतिवादी क्रमांक 1 और 2 के विरूद्ध उसके द्वारा श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) की संपत्तियों का देखरेख व व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से, स्थायी रूप से निषेधित करने के अनुतोष प्राप्त करने के अधिकारी हैं? ‘नहीं‘
07. सहायता एवं व्यय? ‘निर्णय कंडिका-21 अनुसार‘। )

-ःनिष्कर्ष के आधारः- 
-ःवाद प्रश्न क्रमांक 1 एवं 2ः-
7- कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने न्यायालयीन मुख्य परीक्षण में अभिसाक्ष्य दिया है कि वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा की जाती है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वर्ष 1982 में स्वयं की उम्र 16 वर्ष होने के समय, वादग्रस्त संपत्ति के तात्कालिन सर्वराकार/प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित मेले के समय बनाई गई अस्थायी आनंद मठ समिति के सदस्‍यों द्वारा मौके का फायदा उठाकर, वादग्रस्त संपत्ति के संचालन का प्रभार स्वयं प्राप्त कर, वादग्रस्त संपत्ति से संबंधित समस्त भूमि की देखरेख का प्रभार अपने पास रख, अराजकता फैलाना प्रार ंभ कर दिये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण में, वादी क्रमांक 1 समिति के नाम पर सरकारी बैंक अधिकारियो ं से साठगांठ कर, बैंक में खाता खोलकर, वादग्रस्त संपत्ति में संलग्न भूमि से होने वाली आय से कुछ अंश को बैंक में जमा करवाये जाने का तथ्य प्रकट कर, अधिकांश पैसों को हड़पने वालों में, कौशल तिवारी वासा-3, राजेश उर्फ हुलेश्वर प्रसाद वासा-1, केदार प्रसाद तिवारी (मृत वादी क्रमांक 3), शिव कुमार पाण्डे वादी क्रमांक 4 एवं मन्नूलाल टिकरिया वादी क्रमांक 5 के शामिल होने की साक्ष्य प्रकट की है। इसके विपरीत यदि प्रतिवादी क्रमांक 1 के अभिवचनों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जावे, तो ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में प्रकट उक्त साक्ष्य संबंधी अभिवचन, संपूर्ण जवाबदावे में शब्दशः आशय के समाहित होना दर्शित नहीं है। इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने प्रस्तुत अभिवचनों की कंडिका 1 में स्वीकार किया है कि स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता तात्कालिन सर्वराकार भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा एक मंदिर समिति का अस्थायी गठन समय-समय पर ग्राम कौही में भरने वाले मेलों एवं प्रसाद आदि के वितरण को सुचारू रूप से संचालित करने के आशय से किया गया था। यद्यपि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के अभिवचनों में वर्ष 1982 से वादी क्रमांक 1 समिति का कथित अस्थायी गठन का तथ्य उल्लेखित नहीं है। इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य के प्रतिपरीक्षण का अवसर पर्याप्त रूप से वादीगण को प्राप्त होना अभिलेख से स्पष्टतः दर्शित है। फलतः ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य से पूर्व के अभिवचनों की तुलना की जावे, तो यह प्रकट होता है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 वर्ष 1982 से वादी क्रमांक 1 समिति के वादग्रस्त संपत्ति पर समय-समय पर मेला आयोजन के समय अस्थायी गठन के तथ्य को स्वीकार करते हैं। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में, वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख, व्यवस्था हेतु गठित वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वाद संस्थित दिनाँक से विगत् 40 वर्षों से वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख, व्यवस्था किये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में उक्त साक्ष्य का समर्थन किया है।

8- बेनीप्रसाद तिवारी वासा-2 ने अपने मुख्य परीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर वर्ष में दो बार अर्थात् नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि में धार्मिक मेला आयोजित होने, वर्ष की दोनों नवरात्रि में 300 से 400 जोत प्रज्जवलित होने एवं मंदिर में आये चढ़ावे, जोत की सहयोग राशि, जन सहयोग तथा शासकीय सहयोग से वादग्रस्त संपत्ति के समस्त मंदिरों का विकास एवं मेले का आयोजन वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा किये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। जेठूराम वासा-4 ने बेनीप्रसाद तिवारी वासा-2 की अपने मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य का समर्थन किया है। जेठूराम वासा-4 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 5 में, स्वयं की साक्ष्य दिनाँक से 2 वर्ष पूर्व तक ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के सर्वराकार की हैसियत में लगभग 25 एकड़ जमीन होने का तथ्य स्वीकार कर, ऐसी भूमि से उत्पन्न समस्त उत्पाद को आनंद मठ मंदिर समिति के संचालक को प्राप्त होने का तथ्य स्वीकार किया है। जेठूराम वासा-4 की उक्त साक्ष्य से यह दर्शित है कि वर्ष 2016 के लगभग समय के पूर्व तक वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही का वादग्रस्त संपत्ति में कुछ तो योगदान रहा है।

9- योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में, वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आम जन द्वारा चढ़ाये गये चढ़ावे की देखरेख वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। यद्यपि योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आये चढ़ावे से मंदिर के विकास से इंकार कर, स्वतः कथन कर, मंदिर में आये चढ़ावे को वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा अपने फंड में रखकर, मंदिर में बिजली व्यवस्था, प्रसाद वितरण, पुजारी का खर्च, मंदिर के मोटर पंप के सुधार कार्य का खर्च, मंदिर की लिपाई-पुताई, मेले के खर्च आदि में ऐसे चढ़ावे के व्यय किये जाने का तथ्य प्रकट किया है। योगेश्वर साहू प्रसा-2 की उक्त स्वीकारोक्ति से स्पष्ट है कि मंदिर में आये चढ़ावे से मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य करवाया जाता था। योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने अग्र प्रतिपरीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर का विकास श्रद्धालुगण द्वारा करवाये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 63 व योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में, प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि एवं वर्ष की दोनों नवरात्रि में आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा मेले का आयोजन एवं जोत जलवाने का कार्यक्रम पूर्ण करवाये जाने के सुझाव से भी स्वीकारोक्ति प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 स्वयं द्वारा अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में, वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित मेले एवं जोत जलवाने के कार्यक्रम एवं हिसाब किताब आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा विगत् 50 वर्षों से किये जाने का तथ्य भी स्वीकार किया है। यद्यपि स्वतः कथन कर, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पदाधिकारी के हर 6 महीने में बदलने के स्पष्ट तथ्य का रहस्योद्याटन किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 66 में, वादग्रस्त संपत्ति की उपज के विक्रय प्रतिफल का चेक आनंद मठ मंदिर समिति के माध्यम से प्राप्त होने का स्वतः कथन किया है। यद्यपि उभयपक्ष द्वारा उक्ताशय का कोई भी उपज विक्रय से संबंधित प्रतिफल राशि का चेक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसके विपरीत वादीगण की ओ से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 को प्रतिपरीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर उत्पादन के प्रतिफल स्वरूप प्रदत्त चेक, वादग्रस्त संपत्ति के मंदिर में स्थित भगवान के नाम से लेखकर, प्रदत्त किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 20 में, आनंद मठ मंदिर समिति द्वारा स्वयं साक्षी के जन्म के पूर्व से वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर की व्यवस्था वर्ष 1954 से किये जाने के सुझाव को स्वीकार किया है। रामसिंग साहू प्रसा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में, मंदिर में होने वाले आयोजनों के समय श्रद्धालुओं के निवास हेतु सामुदायिक भवन बनवाने एवं दर्शन व्यवस्था हेतु मंदिर में प्रवेश करने बाबत् पाईप लगवाने की व्यवस्था, समिति द्वारा किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। उभयपक्ष के साक्षियों द्वारा उपरोक्तानुसार स्वीकृत साक्ष्य से स्पष्ट है कि आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में होने वाले विभिन्न आयोजनों के साथ साथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य समय-समय पर किया जाता रहा है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा बैंक अधिकारियों से सांठगांठ कर, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के नाम पर बैंक में खाता खुलवाये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अभिवचनों की कंडिका 5-अ में, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज के विक्रय से प्राप्त आय को जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित दुर्ग के खाता क्रमांक 61034000691 में वर्ष 2013 तक गलत ढंग से जमा किये जाने का अभिवचन किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति से उद्भूत आय के कुछ अंश को बैंक मे जमा करवाने एवं अधिकांश पैसों को स्वयं हड़प लिये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 44 में, वादी क्रमांक 1 समिति के बैंक खाते में दिनाँक 01.04.2012 से 31.07.2017 तक जमा राशि के संबंध में खाता स्टेटमेंट की कम्प्यूटरीकृत प्रति (प्रदर्श डी-40) प्रस्तुत की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 40 में आनंद मठ मंदिर समिति की दिनाँक 01.06. 2016 को आयोजित बैठक का एक पंजी में 5 पृष्ठों में उल्लेखित ब्यौरा (प्रदर्श डी-36) प्रस्तुत किया है।
यदि आनंद मठ मंदिर समिति की दिनाँक 01.06.2016 को आयोजित बैठक की पंजी में 5 पृष्ठों में उल्लेखित ब्यौरा (प्रदर्श डी-36) की प्रथम पंक्ति का सूक्ष्मता से परीक्षण किया जावे, तो शीर्षक-‘‘आनंद मठ मंदिर समिति की बैठक‘‘ से स्पष्ट है कि कोई समिति अस्तित्वाधीन थी, जिसकी दिनाँक 01.06.2016 को पुनर्गठन एवं आय-व्यय की जानकारी संधारित करते हुये, ब्यौरे (प्रदर्श डी-36) के प्रथम पृष्ठ पर 12 व्यक्तियों के पास वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर का पैसा उपलब्ध होने से, अविलंब मंदिर के खाते में जमा करने हेतु कहा जा रहा था। स्वयं प्रतिवादीगण की ओर से प्रस्तुत उक्त बैठक के ब्यौरे (प्रदर्श डी-36) में उल्लेखित अंतर्वस्तु से आनंद मठ मंदिर समिति का अस्तित्व होना स्वमेव दर्शित है। कौशल तिवारी वासा-3 ने स्वयं को आनंद मठ मंदिर समिति का उपाध्यक्ष होकर, समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर की देखरेख किये जाने का तथ्य अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में स्वीकार किया है। यद्यपि प्रतिवादीगण की ओर से कौशल तिवारी वासा-3 के प्रतिपरीक्षण में, स्वयं के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष होने की हैसियत से दस्तावेज की वांछा किये जाने पर, कोई दस्तावेज प्रस्तुत किये जाने से स्पष्टतः इंकार किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने अग्र प्रतिपरीक्षण में, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के नाम से कोई समिति पंजीकृत नहीं होने के प्रतिवादीगण के सुझाव से, अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में सहमति व्यक्त की है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 14 में, स्वयं को ग्राम कौही के पुराने सदस्यों द्वारा, वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष घोषित किये जाने का तथ्य प्रकट कर, ऐसी घोषणा से संबंधित कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। यद्यपि वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व से संबंधित कोई दस्तावेज वादीगण की ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया है। वादी क्रमांक 1 समिति की विधि अनुसार पंजीयन के फलस्वरूप अस्तित्वाधीन होने के भी कोई प्रमाण प्राथमिक साक्ष्य से प्रमाणित किये जाने की चेष्टा नहीं की गई है। वादी क्रमांक 1 समिति के कथित उपाध्यक्ष कौशल तिवारी वासा-3 के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष होने के संबंध में कोई दस्तावेज अभिलेख में संलग्न नहीं है। इसके विपरीत उभयपक्षों की स्पष्ट दृढ साक्ष्य है कि-प्रत्येक वर्ष विभिन्न अवसरों पर वादग्रस्त संपत्ति पर मेले, जोत जलवाने के कार्यक्रम का संपूर्ण आयोजन एवं एसे आयोजन का हिसाब किताब वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा पिछले 30-35 वर्षों से किया जाना, अभिलेख पर उपलब्ध है।

10- प्रतिवादीगण की ओर से अभिवचनों एवं अंतिम तर्क स्तर पर यह विवाद्यक उठाया गया है कि वादी क्रमांक 1 समिति को स्वयं का वैधानिक अस्तित्व नहीं होने से, वाद संस्थित किये जाने का कोई अधिकार नहीं है। यद्यपि वादीगण की ओर से वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व से संबंधित आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पंजीयन का कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है, न ही कौशल तिवारी वासा-3 के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष की प्रास्थिति रखने संबंधी कोई दस्तावेजी साक्ष्य अभिलेख पर है। इसके विपरीत स्वयं ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में, आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा विगत् 50 वर्षों से वादग्रस्त संपत्ति पर मेले एवं जोत कार्यक्रम आयोजित किये जाने का तथ्य स्वीकार कर, स्वतः कथन कर समिति के पदाधिकारी का हर 6 माह में बदलने का तथ्य प्रकट किया गया है। स्वयं प्रतिवादीगण की ओर से आनंद मठ मंदिर समिति कौही के बैठक संबंधी विवरण एवं जिला सहकारी केन्द्रीय मर्यादित बैंक में खाता संधारण संबंधी खाता स्टेटमेंट से आनंद मठ मंदिर समिति कौही के अस्तित्व के दृढ प्रमाण उपलब्ध है। प्रतिवादीगण द्वारा वादी क्रमांक 1 समिति के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न करते हुये, वाद लाने के अधिकार को चुनौती दी गई है। इसके विपरीत वादीगण की ओर से वादग्रस्त संपत्ति में हित रखने वाला हितबद्ध व्यक्ति वाद लाने का अधिकार रखता है, का तर्क प्रस्तुत करते हुये निम्नवत् न्याय दृष्टांत प्रस्तुत किया गया हैः-

श्री श्री गोपाल विरूद्ध बलदेव नारायण (1946)2 कोलकाता 447 
प्रतिपादित विधिः-यदि सर्वराकार वाद लाने के लिये अक्षम या अनिच्छुक है, तो भावी सर्वराकार, संस्थापक का विधिक प्रतिनिधी या कोई हितबद्ध व्यक्ति एवं भगवान की मूर्ति स्वयं वादमित्र के माध्यम से वाद संस्थित कर सकती है।

किशोर जौर विरूद्ध गुमान बिहारी जौर 
ए.आइ .आर. 1978, इलाहाबाद 1 
प्रतिपादित विधिः-धार्मिक बंदोबस्ती-भगवान द्वारा या की ओर से वाद अपवादित दशाओं को छोड़कर, सामान्यतः सर्वराकार द्वारा संस्थित किया जा सकता है। अपवादित परिस्थितियों में सर्वराकार से पृथक् व्यक्ति भी भगवान की ओर से वाद ला सकता है। जिलाधीश भी भगवान का व्यवस्थापक होने के नाते वाद ला सकते हैं। वाद पोषणीय माना गया। उक्त न्याय दृष्टांत र्में ए.आइ .आर. 1961 इलाहाबाद 73 पर विश्वास व्यक्त किया गया है।

मुखर्जी द्वारा लिखित ‘‘हिन्दू विधि‘‘ के पृष्ठ क्रमांक 265 पर भगवान को विधिक व्यक्ति मानकर सर्व राकार के माध्यम से वाद संस्थित किये जा सकने की विधि उल्लेखित है। यदि सर्वराकार उपेक्षित या विरूद्ध पक्षकार का है, तो एक पूजा करने वाले/पूजक व्यक्ति या धार्मिक बंदा ेबस्ती में हितबद्ध अन्य व्यक्ति, देवता के अधिकार के संरक्षण हेतु वाद संस्थित करने का हक रखता है।

परसराम दास जी विरूद्ध विजय नारायण 
एस.ए. नं.-3/1970, निर्णय दिः-31.12.1976
प्रतिपादित विधिः-सर्वराकार द्वारा किये गये प्रतिकूल कृत्य के कारण उद्भूत वादकारण हेतु एक पूजक द्वारा भी वाद संस्थित किया जा सकता है। उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि के आलोक में, इस वाद की परिस्थितियों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया जावे, तो यह स्पष्ट है कि वादी क्रमांक 1 समिति के पदाधिकारी एवं सदस्यगण वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आयोजित धार्मिक आयोजनों हेतु समिति का प्रत्येक सदस्य, वादग्रस्त मंदिर पर स्थित भगवान में श्रद्धा रखते हुये, पवित्र भावना के साथ धार्मिक आयोजन (जोत प्रज्जवलन एवं मेला आयोजन) में आस्था रखते हुये, आयोजन की संपूर्ण परंपराओं का निर्वहन करते हुये, संपादित करने के उद्देश्य के साथ भौतिक एवं मानसिक रूप से आवश्यक सहयोग कर, संपादित करते हुये, आ रहे होने की उभयपक्ष की दृढ विश्वसनीय साक्ष्य अभिलेख पर प्रकट हुई है। अतः यह स्पष्ट है कि वादी क्रमांक 1 समिति धार्मिक एवं मानसिक रूप से वादग्रस्त संपत्ति में हितबद्ध व्यक्ति की श्रेणी में आते थे। वादीगण की ओर से प्रस्तुत न्याय दृष्टांत के आलोक में भगवान से हितबद्ध व्यक्ति भी भगवान की संपत्ति की रक्षा हेतु वाद संस्थित कर सकते हैं। अतः वादी क्रमांक 1 समिति को यह वाद संस्थित किये जाने का अधिकार होना प्रमाणित पाया जाता है।

-ःवाद प्रश्न क्रमांक 3ः-
11- अब यह देखा जाना आवश्यक है कि वादग्रस्त संपत्ति का उद्भव कब व कैसे हुआ?
कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 में, स्वयं को वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्थापक समिति का उपाध्यक्ष होना व्यक्त करते हुये, वादग्रस्त संपत्ति की भूमि तात्कालिन मालगुजार रामप्रसाद एवं उनके पूर्वजों द्वारा श्री हनुमान मंदिर, महाकाली मंदिर, हनुमान मंदिर-महाकाली मंदिर के नाम से दी जाने की साक्ष्य प्रकट की है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, कौशल तिवारी वासा-3 के मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य का समर्थन किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 17 में, वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन भगवान द्वारा सर्वराकार को दिये जाने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 में, स्वयं को वर्तमान में रायपुर में परिवार सहित निवास करना व्यक्त करते हुये, अपने स्वामित्व की भूमि को मंदिर में स्थित भगवान हेतु ग्राम कौही में छोड़कर रखे जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पिता द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र द्वारा, ग्राम कौही स्थित समस्त मंदिरों का वर्ष 1922 से 1923 तक निर्माण करवाये जाने की साक्ष्य प्रकट कर, उक्त तथ्य के प्रमाण स्वरूप अधिकांश मंदिरों की दीवार पर स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र का नाम खुदा हुआ होना प्रकट किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, कालांतर में कुछ मंदिरों में रिपेयरिंग के दौरान स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र का नाम मिट/हट जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पूर्वज एवं परिवार के सभी सदस्यों द्वारा मंदिरों की देखरेख किये जाने की साक्ष्य प्रकट कर, मंदिर परिसर के विकास हेतु लगभग 25 से 26 एकड़ भूमि को मंदिर में स्थित भगवान हेतु सुरक्षित कर दिये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 भगवान हेतु 25-26 एकड़ भूमि को सुरक्षित रखे जाने का कारण भूमि को अधिया-रेघा या खुदकाश्त कर, अर्जित आय से मंदिर परिसर की देखरेख किया जाना प्रकट किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अग्र परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र को समस्त मंदिर परिसर का सर्वराकार कहे जाने की साक्ष्य प्रकट की है।
इसके विपरीत यह उल्लेखनीय है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 एवं 2 में, प्रकट तथ्यों को प्रथम बार मुख्य परीक्षण में ही प्रकट किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 एवं 2 में, प्रकट उक्त तथ्यों को स्वयं के अभिवचन अर्थात् जवाबदावा में अभिवचनित नहीं किया है। अभिवचन के प्रमाणन हेतु दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य पेश किये जाने की विधि है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अभिवचनों के अभाव में प्रकट मात्र मुख्य परीक्षण साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम के विधिक प्रावधानों के तहत् अग्राह्य है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति स्वयं के पूर्वज श्री सतनाथ गजेन्द्र द्वारा मंदिर को दिये जाने/सुरक्षित रखे जाने के संबंध में प्रकट साक्ष्य अभिवचनों के अभाव में विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती है। अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग द्वारा ग्राम कौही के सरपंच एवं ग्रामवासी द्वारा मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ राज्य के समक्ष प्रस्तुत आनंद मठ मंदिर समिति कौही को ट्रस्ट समिति घोषित किये जाने बाबत् आवेदन के परिप्रेक्ष्य में दर्ज राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014- 15 में, ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा दिनाँक 03.01. 2015 को आनंद मठ मंदिर समिति के नाम से ट्रस्ट बनाने हेतु पूर्व से प्रस्तुत आवेदन को निरस्त करने बाबत् आवेदन (प्रदर्श पी-18) में वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी एवं निजी न्यास की संपत्ति होना प्रकट कर, ग्राम पंचायत व ग्रामवासी कौही का ट्रस्ट बनाने हेतु दिया गया आवेदन दिनाँकित 09.01.2013 (प्रदर्श पी-14) को निरस्त किये जाने का निवेदन किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा आवेदन दिनाँकित 09.01.2013 (प्रदर्श पी-14) में उल्लेखित अंतर्वस्तु से स्पष्ट दर्शित है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं के निजी संपत्ति होने के संबंध में दावा कर रहे हैं।

12- प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 की ओर से कौशल तिवारी वासा-3 को प्रतिपरीक्षण की कंडिका 17 एवं 18 में यह सुझाव दिये जाने पर कि वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति श्री हनुमान जी, श्री महाकाली देवी, श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी को प्रदत्त किये जाने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है, के तथ्य से सहमति व्यक्त की गई है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 28 में वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर में भगवान के नाम पर भूमि के स्वत्व के संबंध में दान पत्र, विक्रय पत्र, इकरारनामा, बंटवाराना से संबंधित कोई भी पंजीकृत दस्तावेज प्रकरण में प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है।
इस प्रक्रम पर माननीय न्यायालय द्वारा प्रतिपादित न्याय दृष्टांत उल्लेखनीय है-

2006(1) ए.एल.जे. 54 (58) 
प्रतिपादित विधि-भूमि का धार्मिक एवं पूर्त न्यास बंदोबस्त सृजित किये जाने हेतु पंजीकृत विलेख अनिवार्य नहीं है।
उक्त न्याय दृष्टांत के आलोक में, वादग्रस्त संपत्ति को मूल भूमिस्वामी द्वारा भूमि को भगवान के नाम पर प्रदत्त किये जाने हेतु किसी पंजीकृत दस्तावेज निष्पादित करने की विधिक अनिवार्यता नहीं होने से, वादीगण द्वारा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने से कोई प्रतिकूल प्रभाव किसी भी पक्ष पर नहीं पड़ता है।

 तालिका 2
 वादग्रस्त संपत्ति के प्रारंभ से वर्तमान तक का विस्तृत विवरण


 इसके विपरीत तालिका क्रमांक 2 में उल्लेखित विस्तृत विवरण से स्पष्ट है कि प्रारंभ में वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन लंबरदार व दीगर हिस्सेदारों के स्वामित्व की होकर, भगवान श्री हनुमान, श्री महाकाली देवी एवं श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी को प्रदत्त किये जाने पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुई।

तात्कालिन प्रवर्ति त विधि म.प्र. भू राजस्व संहिता की धारा 158(3) के अनुसार-प्रत्येक व्यक्ति-(एक) जो राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे म0प्र0 भू राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम 1992 के प्रारंभ पर या उसके पूर्व मंजूर किये गये किसी पट्टा के आधार पर भूमिस्वामी अधिकार में भूमि धारण किये हुये हैं, एसे प्रारंभ की तारीख से, और। 
(दो) जिसे राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे म0प्र0 भू राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम 1992 के पश्चात् किया गया है, एसे आबंटन की तारीख से, ऐसी भूमि के संबंध में भूमिस्वामी समझा जावेगा और उन समस्त अधिकारों तथा दायित्‍वों के अध्यधीन होगा, जो इस संहिता के द्वारा या उसके अधीन किसी भूमिस्वामी को प्रदत्त और उस पर अधिरोपित किये गये हैं।

भू राजस्व संहिता के प्रवर्तन में आने की दिनाँक अर्थात् 21.09.1959 से वादग्रस्त संपत्ति को भगवान श्री हनुमान, श्री महाकाली देवी, श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी के भूमिस्वामी हक में उक्त उपबंध के आलोक में दर्ज किया गया था।

13- सर्वप्रथम वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार बिहारी लाल ब्राम्हण का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज होना दर्शित है। तत्पश्चात् वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में सर्वराकार के रूप में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता भुवनलाल गजेन्द्र का नाम दर्ज हुआ। किश्तबंदी खतौनी वर्ष 1980-81 (प्रदर्श पी-6) से वर्ष 2011 तक प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र का नाम किस आधार पर राजस्व अभिलेखों में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर के सर्वराकार के रूप में दर्ज हुआ, का कोई स्पष्टीकरण राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं है। किसी भी पक्ष द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र का नाम सर्वराकार के रूप में दर्ज होने के पश्चात् लिखित आपत्ति किसी भी सक्षम कार्यालय में प्रस्तुत किये जाने की कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गई है। तत्पश्चात् दिनाँक 27.09.2012 से वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में विरासतन हक के आधार पर प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम सर्वराकार के रूप में दर्ज हुआ। वादीगण द्वारा यह वाद दिनाँक 21.06.2016 को संस्थित किया गया है। प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के सर्वराकार नियुक्त होने की दिनाँक 27.09.2012 से वाद संस्थित दिनाँक तक किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 1 के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार नियुक्ति को चुनौती दिये जाने संबंधी कोई दस्तावेजी साक्ष्य अभिलेख पर प्रस्तुत नहीं की गई है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में स्वतः कथन कर, प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा स्वयं अपना नाम वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में सर्वराकार के रूप में दर्ज करवा लिया जाना प्रकट किया है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में दर्ज होने पर, लिखित आपत्ति प्रस्तुत किये जाने का तथ्य स्वीकार करते हुये, एेसी प्रस्तुत आपत्ति की प्रति को प्रकरण में प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 25 में वादग्रस्त संपत्ति पर ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम सर्वराकार के रूप में नामांकित होने की कार्यवाही के विरूद्ध कोई अपील अथवा पुनरीक्षण सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किये जाने के तथ्य को भी स्वीकार किया है। वादीगण के द्वारा ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में दर्ज होने को चुनौती नहीं दिये जाने से स्पष्ट है कि वादीगण को ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार होने पर कोई आपत्ति न होकर, मौन सहमति थी।

14- ‘‘सर्वराकार‘‘ से आशय एक-‘‘ऐसे जीवित व्यक्ति, जो धार्मिक स्थापना की व्यवस्था, रखरखाव एवं सुधार स्थापना की निर्मित संरचना को संरक्षित करने के उद्देश्य से नियुक्त हो, से है।‘‘ वर्ष 1929-30 से वर्ष 2015-16 तक के राजस्व अभिलेखों, समस्त वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर के भगवान के नाम पर होना तालिका 2 की अंतर्वस्तु से स्पष्ट है। तालिका 2 के विवरण से सर्वप्रथम बिहारी लाल ब्राम्हण तत्पश्चात् स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र एवं वर्ष 2016 तक ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के सर्वराकार अर्थात् वादग्रस्त संपत्ति में स्थित भगवान की संपत्ति को संरक्षित एवं संवर्धित करने के उद्देश्य से नियुक्त किये जाने का आशय स्पष्टतः दर्शित है।
15- ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी संपत्ति होने का दावा राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014-15 में किया गया है। इस प्रक्रम पर वादग्रस्त संपत्ति के लोक/निजी होने के संबंध में निम्नलिखित परीक्षण अनिवार्य हैः-
तालिका 3
वादग्रस्त संपत्ति के निजी अथवा लोग प्रकृति के संबंध में परीक्षण


16- ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं वादी की ओर से प्रस्तुत वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 04.06.2016 के पृष्ठ क्रमांक 3 में उल्लेखित कंडिका 1 में, स्वयं वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी संपत्ति होना स्वीकार किया है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि में निर्धारित मानदण्ड के आला ेक में अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य से, वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति न होकर, लोक प्रकृति की संपत्ति होना प्रमाणित पाया जाता है।

-ःवाद प्रश्‍न 4 एवं 5ः-
17- कौशल तिवारी वासा-3 एवं राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में, ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा सर्वराकार की हैसियत से वादग्रस्त संपत्ति को बिना किसी वैधानिक आवश्यकता के व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में, वादग्रस्त संपत्ति का मूल्यांकन लगभग रू0 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) कर, रमेश मोदी प्रसा-4/प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में अवैध रूप से हस्तांतरित किये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण में, स्वयं द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) निष्पादित किये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। वादीगण की ओर से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा विश्व हिन्दू परिषद के छत्तीसगढ़ प्रांत के प्रदेश अध्यक्ष रमेश मोदी प्रसा-4 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) को अपने साक्ष्य के समर्थन में प्रस्तुत कर, व्यवस्था पत्र को अवैध एवं शून्य घोषित किये जाने के अनुतोष की वांछा की गई है। वादीगण की ओर से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 को प्रतिपरीक्षण की कंडिका 80 में, स्वयं के सर्वराकार के पद पर पदस्थ होने एवं मंदिर की संपत्ति को अंतरित करने का अधिकार नहीं होने का सुझाव दिये जाने पर ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा असहमति व्यक्त की गई है।

18- ढालेन्द्र राम गजेन्द प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02. 2016 (प्रदर्श पी-8) के माध्यम से क्या व्यवस्था की र्गइ ?
 उक्त तथ्य के परीक्षण हेतु व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाना आवश्यक है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 3 पर, वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी भूमि होना स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 4 पर, वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में कंडिका 9 में-‘‘उक्त समस्त भूमि, मकान, मंदिर को विक्रय नहीं किया जा सकता है‘‘, का तथ्य स्वीकार करते हुये, विशिष्ट रूप से उल्लेखित किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 1 में उल्लेखित कंडिका 1 में, छत्तीसगढ़ विश्व हिन्दू परिषद के पदेन अध्यक्ष को वादग्रस्त संपत्ति के उत्तरोत्तर विकास व जन कल्याण कार्य की गति तीव्र करने के उद्देश्य से सर्वराकार नियुक्त किये जाने का तथ्य उल्लेखित किया है। संपूर्ण व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में, प्रतिवादी क्रमांक 2 से कोई भी प्रतिफल राशि प्राप्त किये जाने का तथ्य उल्लेखित नहीं है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में स्वीकृत उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 ने वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार होने के नाते वादग्रस्त संपत्ति के उत्तरोत्तर विकास के उद्देश्य से, वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी भूमि होना व्यक्त कर, प्रतिवादी क्रमांक 2 को व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के माध्यम से, मात्र सर्वराकार की हैसियत प्रदान कर, वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में आगामी व्यवस्था की है। यदि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा उक्त व्यवस्था के एवज मे किसी भी प्रकार का अर्थ/प्रतिफल प्राप्त किया जाता, तो ऐसा संव्यवहार हस्तांतरण की परिधि में आता।

19- वादीगण की ओर से प्रस्तुत न्याय दृष्टांत
रामेश्वर दयाल विरूद्ध हरप्रसाद भार्ग व, 
सिविल मिसलेनियस अपील नम्‍बरर 159/1985, 
निर्ण य दिनाँक 09.11.1986 
प्रस्तुत कर, तर्क दिया गया है कि ‘‘सेवायत-अधिकार, किसी अन्य के पक्ष में नहीं छोड़ा जा सकता- ऐसे अधिकार का संपत्ति पर भी निश्चित् प्रभाव होता है-अधिकार विनिश्चित् किया जाना चाहिये।‘‘
विचार विमर्श ः- उक्त न्याय दृष्टांत का पूर्ण परिशीलन किये जाने से दर्शित है कि न्याय दृष्टांत में उभयपक्ष के मध्य माध्यस्थम करार था और ऐसे माध्यस्थम करार के परिप्रेक्ष्य में माननीय विचारण न्यायालय द्वारा सर्वराकार के अधिकार के प्रश्न पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है। विचारण न्यायालय के निष्कर्ष को माननीय अवर न्यायालय द्वारा पुष्टि की गई है। संस्थित वाद में उभयपक्ष के मध्य कोई माध्यस्थम करार का अस्तित्व दर्शित नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में माध्यस्थम करार के माध्यम से सर्वराकार के अधिकार के निर्धारण बाबत् न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि पर इस वाद में विश्वास व्यक्त करते हुये, लागू नहीं किया जा सकता है। अतः उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि का र्कोइ लाभ वादीगण को प्राप्त नहीं होता है।
वादीगण की ओर से एक अन्य न्याय दृष्टांत

काली किंकोर गांगुली विरूद्ध पन्ना बैनर्जी एवं अन्य, 
व्यवहार अपील क्रमांक 1115/1973, निर्ण य दिनाँक 16.08.1974,र् 
ए.आइ .आर. 1974, सुप्रीम कोर्ट 1932 प्रस्तुत कर, सर्वराकार के अधिकार को अंतरित नहीं किये जाने का तर्क प्रस्तुत किया गया है।
प्रतिपादित विधिः-सह सर्वराकार द्वारा अजनबी के पक्ष में सर्वराकार की अधिकारिता में स्वयं के आधे अंश को मंदिर एवं संपत्ति को विक्रय विल ेख के माध्यम से अंतरित किया जाना अवैध एवं शून्य माना गया। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि मंदिर/देवता/सर्वराकार के अधिकार आर्थिक प्रतिफल के लिये अंतरित नहीं किये जा सकते हैं।

विचार विमर्श ः- संस्थित वाद में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के निष्पादन के समय वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत रखी जाती थी। इसके विपरीत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08. 02.2016 (प्रदर्श पी-8) की अंतर्वस्तु से स्पष्टतः दर्शित है कि सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा वादग्रस्त संपत्ति में सर्वराकार की व्यवस्था करने में कोई आर्थिक प्रतिफल प्राप्त नहीं किया है। अतः संस्थित वाद में वादीगण की ओर से प्रस्तुत उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि प्रवर्तित नहीं होती है।
संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति की वैधानिक प्रास्थिति के संबंध में प्रतिवादीगण द्वारा कौशल तिवारी वासा-3 को प्रतिपरीक्षण में सुझाव दिये जाने पर साक्षी द्वारा वादी क्रमांक 1 समिति के पंजीकृत/अपंजीकृत होने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया गया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में साक्ष्य दिनाँक तक वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पंजीकृत नहीं होने का तथ्य स्वीकार किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में स्वयं की प्रास्थिति वादी क्रमांक 1 समिति के कोषाध्यक्ष होने के संबंध में घोषणा का आधार पूछे जाने पर, ग्राम कौही के पुराने सदस्यों द्वारा स्वयं कौशल तिवारी वासा-3 को आनंद मठ मंदिर समिति का उपाध्यक्ष घोषित किये जाने का तथ्य प्रकट किया है। कौशल तिवारी वासा-3 अपने प्रतिपरीक्षण में, स्वयं को वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष घोषित करने वाले ग्राम कौही के ऐसे कथित किसी पुराने सदस्य का नाम प्रकट करने में असफल रहे हैं। वादी क्रमांक 1 समिति का सर्वप्रथम गठन किन पदाधिकारी एवं सदस्‍यों को समाहित कर, किया गया, का कोई प्रमाण वादीगण की ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा ‘‘वादी क्रमांक 1 समिति के सदस्यगण का हर 6 माह में बदलते रहने‘‘ का तथ्य स्वतः कथन करते हुये, अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में प्रकट किया गया है।

प्रतिवादीगण द्वारा स्वयं के अभिवचनों में वादी क्रमांक 1 समिति को अस्थायी समिति होना उल्लेखित करते हुये, समर्थनकारी साक्ष्य प्रकट की गई है। इसके विपरीत वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व के संबंध में वादीगण पर प्रमाण प्रस्तुत किये जाने का प्रमाण भार था। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 16 में वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था की दीर्धकालीन सतत् जिम्मेदारी वादी क्रमांक 1 समिति पर होने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है।
अस्तित्वाधीन परिस्थितियों में वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की नियुक्ति समिति के पदाधिकारियों व सदस्‍यों की सहमति से होने संबंधी नियम-विनियम का भी अस्तित्व दर्शित नहीं है।

ए.आइ .आर. 1916 मद्रास 475 (477) डी.बी
प्रतिपादित विधिः-‘‘मंदिर समिति द्वारा इस बाबत् घोषणा वाद कि ‘‘वादग्रस्त मंदिर समिति के नियंत्रण में होकर, समिति द्वारा नियुक्त व्यवस्थापक द्वारा ही प्रबंधित होना चाहिये।‘‘ ऐसी परिस्थितियों में समिति को व्यवस्थापक की नियुक्ति का अधिकार स्वयं में निहित होकर, प्रमाणित करना आवश्यक है।

विचार विमर्श ः- संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति की वैधानिक पंजीकृत प्रास्थिति, समिति के नियम-उप नियम ही सृजित/निर्धारित नहीं है। साथ ही स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के सर्वराकार की हैसियत से वादी क्रमांक 1 समिति नेा अपने आचरण से दोनों ही सर्वराकार की नियुक्ति दिनाँक से किसी भी प्रकार से चुनौती न देकर, मौन रूप से स्वीकृति दी है। ऐसी स्थिति में संस्थित वाद में समिति की वैधानिक नींव व स्वयं द्वारा संपादित कार्यप्रणाली नियम-विनियम के सृजन की शक्ति के अभाव में, वादी क्रमांक 1 समिति का वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की नियुक्ति का स्वयं के नियंत्रण में होने की दलील स्वीकार्य योग्य नहीं है।
संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति के सृजित नियम-विनियम नहीं होने से, यह नहीं कहा जा सकता कि वादी क्रमांक 1 समिति को ही वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार नियुक्त करने का अधिकार था। शासकीय अधिकार अभिलेखों में भी उक्त दोनों को सर्वराकार बनने को भी किसी सरकार द्वारा आपत्ति नहीं कर, दोनों सर्वराकार अर्थात् स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम नियमानुसार इंद्राज है। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र को वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार स्वयं के आचरण से स्वीकार किया गया था। इसलिये स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार बनने को कोई चुनौती यथासमय किसी सक्षम फोरम में नहीं दी। उक्त परिस्थितियों में वादी क्रमांक 1 समिति वादग्रस्त संपत्ति के प्रतिनिधित्व व संपत्तियों की मांग करने का अधिकार नहीं रखती है।

संस्थित वाद में उपलब्ध साक्ष्य की उपबंधित विधि के आलोक में उक्तानुसार विवेचना से वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र को वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) निष्पादित करने का अधिकारी नहीं होना नहीं कहा जा सकता है। फलतः प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) अवैध/शून्य होना दर्शित नहीं है।

-ःवाद-प्रश्‍न क्रमांक 6ः-
20- वाद प्रश्न क्रमांक 3 की साक्ष्य विवचेना से, वादग्रस्त संपत्ति सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 की निजी संपत्ति होना प्रमाणित नहीं हुआ है। वादग्रस्त संपत्ति मंदिर में विराजित भगवान की संपत्ति पाई गई है। ऐसी परिस्थितियों में वादी क्रमांक 1 समिति वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में स्थायी निषेधाज्ञा का अनुतोष प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

-ःवाद-प्रश्‍न क्रमांक 7ः- 
21- वाद-प्रश्न क्रमांक 1 से 6 की साक्ष्य विवेचना से, संस्थित व्यवहार वाद में निम्नवत् आशय की डिक्री पारित की जाती हैः- 1- वादीगण का वाद निरस्त किया जाता है। 2- उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे। 3- अधिवक्ता शुल्क नियमानुसार देय हो।
निर्णय आज दिनाँकित, हस्ताक्षरित मेरे निर्देशानुसार निर्णय कर, घोषित किया गया।
(कु. स्मिता रत्नावत) 
नवम अपर जिला न्यायाधीश, दुर्ग (छ.ग.)

Saturday, 17 August 2019

Motor accident claim Award श्रीमती शांति देवी विरुद्ध विक्रम सिंह यादव

न्यायालय: प्रथम अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण दुर्ग  (छत्तीसगढ़)
(पीठासीन अधिकारी: अजीत कुमार राजभानू)
Motor accident claims tribunal
क्लेम प्रकरण क्रमांक-213/2017
संस्थित दिनांक: 18-05-2017
1. श्रीमती शांति देवी जौजे स्व.किशनलाल यादव, उम्र लगभग 65 वर्ष ।
2. महेन्द्र यादव पिता स्व.किशनलाल यादव, उम्र लगभग 45 वर्ष ।
3. नरेन्द्र यादव पिता स्व.किशनलाल यादव, उम्र लगभग 42 वर्ष ।
4. सुरेन्द्र यादव पिता स्व.किशनलाल यादव, उम्र लगभग 40 वर्ष ।
5. राजकुमार यादव पिता स्व.किशनलाल यादव, उम्र लगभग 37 वर्ष ।
सभी निवासी: बजरंग पारा, भिलाई-3
तहसील पाटन, जिला दुर्ग (छ.ग.) .... आवेदकगण
।। विरुद्ध ।।
1. विक्रम सिंह यादव पिता आनंदराम यादव, उम्र 26 वर्ष
2. आनेदी राम यादव पिता गजाराम यादव, उम्र 42 वर्ष
दोनों निवासी: ग्राम बरबंदा, थाना विधानसभा रायपुर, जिला रायपुर (छ.ग.)
(मोटरसायकल क्रमांक सी.जी.04-सी.एल./5347 के क्रमशः चालक एवं स्वामी)
3. रिलायेस इंश्योरेन्स कम्पनी लिमिटेड द्वारा: शाखा प्रबंधक, शॉप नंबर 412-413, फोर्थ फ्लोर, रवि भवन जय स्तम्भ चौक, रायपुर, जिला रायपुर (छ.ग.)
(मोटरसायकल क्रमांक सी.जी.04-सी.एल./5347 का बीमा कम्पनी) ..... अनावेदकगण
------------------------------------------------
आवेदकगण की ओर से श्री अवधेश सिंह Mr. Awadhesh Singh, अधिवक्ता ।
अनावेदक क्रमांक-1 व 2 की ओर से श्री रवि शर्मा Mr. Ravi Sharma, अधिवक्ता ।
अनावेदक क्रमांक-3 की ओर से श्री ललित जोशी Mr. Lalit Joshi, अधिवक्ता Advocate ।
------------------------------------------------
।। अधिनिर्णय Award।।
(आज दिनांक 06 अगस्त, 2019 को घोषित किया गया)
1- आवेदकगण की ओर से यह दावा आवेदन, वाहन दुर्घटना  accident में आवेदिका क्रमांक-1 के पति तथा शेष आवेदकगण के पिता किशनलाल यादव की मृत्यु हो जाने के परिणामस्वरूप अनावेदकगण से कुल 82,98,400/-रुपये क्षतिपूर्ति compensation दिलाये जाने हेतु मोटर यान अधिनियम की धारा-166 Section -166 of Motor vehicle act के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है ।
2- प्रकरण में यह अविवादित undisputed है कि दुर्घटना दिनांक 13-03-2017 को अनावेदक क्रमांक-2 के स्वामित्व की दुर्घटनाकारित वाहन मोटरसायकल क्रमांक सीजी. 04 - सी.एल. 5347 को अनावेदक क्रमांक-1 चला रहा था तथा उक्त वाहन का बीमा अनावेदक क्रमांक-3 बीमा कम्पनी Insurance company के द्वारा किया गया था।
3- आवेदकगण की ओर से प्रस्तुत दावा Claim आवेदन का सार इस प्रकार है कि दुर्घटना दिनांक 13-03-2017 को किशनलाल यादव (अब मृत) रात्रि लगभग 8.00 बजे अपने बेटे के बच्चों के लिये चाकलेट खरीदकर वापस आ रहे थे, तभी रोड क्रॉस करते समय मेन रोड पर भिलाई-3 Bhilai-3 on Main Road स्थित सेण्ट्रल बैंक एटीएम के सामने मोटर सायकल क्रमांक सी.जी.04-सी.एल./5347 के चालक द्वारा अपनी वाहन को तेजी एवं लापरवाही पूर्वक Carelessly चलाते हुये किशनलाल यादव को ठोकर मारकर दुर्घटना कारित कर दिया, जिससे उसे तथा बच्चों रिद्धिमा यादव एवं आर्यन यादव को गम्भीर चोटें आयी। उपचार हेतु उन्हें चंदूलाल चंद्राकर अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने  किशन लाल को मृत घोषित pronounced dead कर दिया तथा डॉक्टरों द्वारा वहां रिद्धिमा का उपचार सम्भव नहीं होना बताये जाने पर उसे अपोलो बी.एस.आर.हॉस्पिटल, भिलाई ले जाकर भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान दिनांक 16-03-2017 को रिद्धिमा यादव की मृत्यु हो गई । दुर्घटना की रिपोर्ट accident report पुलिस थाना पुरानी भिलाई Police Station Old Bhilai, जिला दुर्ग में दर्ज करायी गई थी, जहां अनावेदक क्रमांक-1 के विरुद्ध भा.दं.संहिता की धारा-279, 337 एवं 304 (ए) Sections 279, 337 and 304 (A) of the Indian Penal Code के अंतर्गत अपराध क्रमांक-87/2017 पंजीबद्ध Registered किया जाकर विवेचना उपरान्त, न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी, भिलाई-3 के न्यायालय में अभियोग-पत्र Charge sheet प्रस्तुत किया गया था ।

4- दुर्घटना के समय मृतक किशनलाल साउथ ईस्टर्न रेल्वे से इलेक्ट्रो ड्राईवर के पद से सेवानिवृत्त हुआ था और उसे प्रतिमाह 29,160/-रुपये प्राप्त होता था । स्व.किशनलाल पर पूरे परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी थी । उसके लड़के नरेन्द्र यादव की किडनी खराब हो जाने से वर्ष 2009 से हर माह 8-9 बार डायलिसिस हो रहा है, जिसका खर्च भी मृतक ही उठाते थे । यदि किशनलाल जीवित रहते, तो उपरोक्तानुसार पेंशन की राशि अर्जित करके अपने परिवार का पालन-पोषण Family upbringing करते, जिसकी असामयिक मृत्यु हो जाने से उसके परिवार के सदस्य उचित देखरेख से वंचित हो गये हैं तथा नरेन्द्र यादव का डायलिसिस रूक गया है, जिसके कारण उसके जीवित रहने की सम्भावना क्षीण होती जा रही है, जिसे भविष्य में कभी पूरा नहीं किया जा सकता है । अतः मोटर दुर्घटना में किशनलाल की मृत्यु होने से आवेदिका क्रमांक-1 को पति के स्नेह Husband's affection, साहचर्य सुख Associative pleasure से वंचित होने तथा शेष आवेदकगण को पितृ-स्नेह व संरक्षण Paternal Affection and Protection से वंचित होने, मृतक के अन्तिम संस्कार Funeral, आश्रितता एवं सम्पदा की हानि , मानसिक सन्ताप एवं पीड़ा इत्यादि विभिन्न मदों में कुल 82,98,400/-रुपये क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का निवेदन किया गया है ।
5- अनावेदक क्रमांक-1 तथा 2 की ओर से, दावा आवेदन के तथ्यों से इन्कार करते हुये इस आशय का जवाबदावा rejoinder प्रस्तुत किया गया है कि आवेदकगण के द्वारा क्षतिपूर्ति राशि का आंकलन झूठे एवं असत्य आधारों पर बढा़-चढा़कर  किया गया है । मृतक किशनलाल यादव द्वारा लापरवाहीपूर्वक सड़क पार करने के कारण वे दुर्घटनाग्रस्त हुये हैं, जिसमें स्वयं किशनलाल की लापरवाही थी । अनावेदक क्रमांक-1 द्वारा वाहन का किसी भी प्रकार से लापरवाहीपूर्वक चालन नहीं किया गया है, बल्कि आवेदकगण द्वारा उसके विरुद्ध झूठी रिपोर्ट False report दर्ज करायी गई है, इसके बाद भी यदि अनावेदक क्रमांक-1 व 2 को प्रकरण में आलिप्त होना पाया जाता है, तो अंशदायी उपेक्षा माना जाना उचित होगा । अनावेदक क्रमांक-1 वैध चालन अनुज्ञप्तिधारी चालक है तथा अनावेदक क्रमांक-2 का वाहन बीमा कम्पनी के पास विधिवत् बीमित था, इसलिये क्षतिपूर्ति राशि की अदायगी के लिये अनावेदक क्रमांक-3 बीमा कम्पनी की जवाबदारी है, अतः इनके विरुद्ध दावा निरस्त किया जावे।

6- अनावेदक क्रमांक-3 बीमा कम्पनी की ओर से दावा आवेदन के समस्त तथ्यों से इन्कार करते हुये अपने जवाबदावा में आवेदन-पत्र के अभिवचनों को जानकारी के अभाव में अस्वीकार किया गया है तथा यह अभिवचन है कि दुर्घटना, अनावेदक क्रमांक-1 द्वारा उपेक्षापूर्ण वाहन चालन के कारण नहीं हुई है, बल्कि मृतक किशनलाल द्वारा बिना दांये-बांये देखे, लापरवाहीपूर्वक हाईवे रोड पार करने के कारण घटित हुई है, जिसके लिये मृतक स्वये जिम्मेदार है । किसी व्यक्ति के विरुद्ध दाण्डिक कार्यवाही Criminal proceedings किये जाने मात्र से ही दुर्घटना के लिये उसे पूर्ण रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है । आवेदकगण द्वारा असत्य एवं कपोल-कल्पित आधारों पर क्षतिपूर्ति राशि की मांग की गई है । बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुसार दुर्घटना दिनांक को बीमाधारी वाहन का पंजीकृत स्वामी हो, वाहन का उपयोग पॉलिसी में उल्लेखित उपयोगिता के लिये ही किया जाना चाहिये । वाहन चालक का ड्राईविंग लाईसेंस, परमिट एवं फिटनैस बनावटी, फर्जी अथवा अनुपयुक्त पाये जाने की दशा में बीमा पॉलिसी की शर्तो का स्पष्ट उल्लंघन होने से अनावेदक क्रमांक-3 प्रतिकर राशि Compensation amount की अदायगी हेतु जिम्मेदार नहीं होगा । यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि दुर्घटना में मोटरसायकल चालक की भी लापरवाही थी, तो उक्त दुर्घटना के लिये योगदायी-उपेक्षा Contributory neglect के सिद्धान्त के आधार पर समान रूप से जिम्मेदार एवं उत्तरदायी मानते हुये क्षतिपूर्ति अदायगी का निर्धारण किया जावे। मोटर यान अधिनियम की धारा-147 एवं 149 का उल्लंघन होने की दशा में क्षतिपूर्ति अदायगी हेतु बीमा कम्पनी का कोई दायित्व नहीं है, अतः आवेदकगण का दावा आवेदन निरस्त किया जावे ।
7- उभय-पक्षकारों के अभिवचनों pleadings एवं प्रकरण में संलग्न दस्तावेजों के आधार पर  निम्नलिखित वाद-प्रश्न issues विरचित किये गये हैं, जिन पर साक्ष्य-विवेचना के आधार पर निष्कर्ष दिया जा रहा है:-
वाद-प्रश्न निष्कर्ष
1. क्या घटना दिनांक 13-03-2017 को सेण्ट्रल बैंक एटीएम, भिलाई-3, मेन रोड के सामने मोटरसायकल क्रमांक सी.जी. 04- सी.एल. 5347 के चालक द्वारा वाहन को तेजी एवं लापरवाहीपूर्वक चलाकर मृतिका रिधिमा को ठोकर मारकर दुर्घटना कारित की गई, जिससे उसे गम्भीर चोटें आयी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई ?
’’प्रमाणित’’
2. क्या उक्त दुर्घटना, मृतिका रिधिमा की लापरवाही के कारण घटित हुई थी ?
’’प्रमाणित नहीं’’
3. क्या अनावेदक क्रमांक-1 द्वारा प्रश्नगत् वाहन का चालन बीमा कम्पनी की शर्तो  के उल्लंघन मे किया जा रहा था ?
’’प्रमाणित नहीं’’
4. क्या आवेदकगण, अनावेदकगण से संयुक्त या पृथक्तः क्षतिपूर्ति राशि पाने के अधिकारी हैं ?
’आवेदकगण, अनावेदक क्रमांक-1 से 3 से संयुक्त एवं पृथक्-पृथक् रूप से 8,97,640/- रुपये क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने के अधिकारी हैं’’
5. सहायता एवं वाद व्यय ? ’’अधिनिर्णय की अन्तिम कंडिका के अनुसार’’
।। वाद-प्रश्न क्रमांक-1 व 2 पर सकारण निष्कर्ष  ।।
8- आवेदकगण की ओर से अपने पक्ष-समर्थन में राजकुमार यादव (आसा-1) तथा प्रवीण सिरिया का कथन कराया जाकर प्रदर्श पी-1 से प्रदर्श पी-30 तक के दस्तावेजों को प्रमाणित करते हुये प्रदर्श अंकित कराया गया है, जबकि अनावेदकगण की ओर से किसी भी साक्षी का कथन नहीं कराया गया है ।
9- आवेदक राजकुमार यादव (आ.सा-1), जो मृतिका रिधिमा यादव का पिता है, ने अपने साक्ष्य में कथन किया है कि स्वर्गीय रिधिमा यादव इनकी बेटी थी । घटना दिनांक 13-03-2017 की रात्रि लगभग 8.00 बजे की है, इनके पिताजी इसके भतीजे आर्यन और इसकी बेटी रिद्धिमा को लेकर चाकलेट खिलाने के लिये जी.ई.रोड के उस पर गये हुये थे। चाकलेट खिलाकर वापस आ रहे थे और जैसे ही सर्विस रोड पार करके जी.ई.रोड के किनारे खड़े थे, तभी दुर्ग की ओर से आ रही मोटर सायकल क्रमांक सी.जी. 04- सी.एल. 5347 के चालक द्वारा तेजी एवं लापरवाही पूर्वक चलाकर इनके पिताजी तथा दोनों बच्चों को काफी गम्भीर चोटें पहुंचायी, जिन्हें उपचार हेतु चंदूलाल चंद्राकर अस्पताल ले जाया गया, जहां इनके पिता किशनलाल यादव को ईलाज के पश्चात् मृत घोषित कर दिया गया एवं डॉक्टरों द्वारा रिद्धिमा का ईलाज सम्भव नहीं होना बताये जाने से उसे अपोलो अस्पताल, नेहरू नगर भिलाई लेजाकर भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान दिनांक 16-03-2017 को रिद्धिमा यादव की भी मृत्यु हो गई । दुर्घटना की रिपोर्ट इसके भाई सुरेन्द्र यादव द्वारा  भिलाई-3 थाने में दर्ज करायी गई थी ।
10- आवेदक ने दुर्घटना से सम्बंधित दाण्डिक प्रकरण से सम्बंधित दस्तावेज अन्तिम प्रतिवेदन प्रदर्श पी-1, प्रथम सूचना प्रतिवेदन प्रदर्श पी-2, मर्ग इंटीमेशन प्रदर्श पी-3, पुलिस इन्फार्मेंशन प्रदर्श पी-4, पुलिस विभाग द्वारा दी गई सूचना प्रदर्श पी-5, नक्शा पंचायतनामा प्रदर्श पी-6, शव परीक्षण आवेदन एवं रिपोर्ट प्रदर्श पी-7 व प्रदर्श
पी-8, अपराध विवरण फार्म प्रदर्श पी-9, सम्पत्ति जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-10, गिरफ्तारी पत्रक प्रदर्श पी-11, वाहन स्वामी का प्रमाण-पत्र प्रदर्श पी-12, वाहन मुलाहिजा रिपोर्ट प्रदर्श पी-13 एवं सुपुर्दनामा आदेश प्रदर्श पी-14 प्रस्तुत किया है ।
प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने अस्वीकार किया है कि यह घटनास्थल पर नहीं था और घटना देखने का झूठा कथन कर रहा है । इसने कथन किया है कि घटना दिनांक को यह घटनास्थल से 100 फीट की दूरी पर स्थित तिवारी पान की दुकान में बैठा था, उस समय इसके साथ इसके दोस्त प्रवीण सिरिया एवं धनराज भी बैठे हुये थे। यह
अस्वीकार किया है कि घटना के समय घटनास्थल पर अंधेरा था, स्वतः कहा कि वहां लाईट थी । यह स्वीकार किया है कि घटनास्थल पर रोड पार करने के लिये जेब्रा क्रॉसिंग नहीं है । साक्षी ने इस तथ्य से इन्कार किया है कि इनके पिताजी की लापरवाही के कारण दुर्घटना हुई थी ।
11- दुर्घटना के बिंदु पर साक्षी प्रवीण सिरिया (आ.सा-2), जो कि घटना का प्रत्यक्षदर्शी साक्षी Eye witness है, ने भी घटना का समर्थन करते हुये इस आशय का कथन किया है कि घटना दिनांक 13-03-2017 कों रात्रि लगभग 8.00 बजे की है, स्व. किशनलाल यादव दो बच्चों के साथ जी.ई.रोड के किनारे सर्विस रोड पर खड़े  थे, एक बच्चा उनके गोद में था और दूसरू बच्चे के हाथ को पकड़कर खड़े थे, जहां से 50 कदम की दूरी पर यह साक्षी खड़ा था । दुर्ग की तरफ से एक मोटर सायकल क्रमांक सी.जी. 04- सी.एल. 5347 के चालक ने तेजी एवं लापरवाही पूर्वक चलाकर ठोकर मार दिया, जिससे किशनलाल यादव तथा दोनों बच्चों को चोटें आयी थी । इसने चोट लगे व्यक्तियों को चंदूलाल चंद्राकर अस्पताल में भर्ती करवाया था,  जहां किशनलाल यादव की मृत्यु हो गई तथा रिद्धिमा यादव को उक्त अस्पताल से अपोलो बी.एस.आर.अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां ईलाज के दौरान रिद्धिमा यादव की भी मृत्यु हो गई ।
12- साक्षी ने प्रतिपरीक्षण में अस्वीकार किया है कि घटनास्थल रोड पर डिवाईडर बना हुआ है, किन्तु इस तथ्य कों स्वीकार किया है कि घटनास्थल से पैदल चलकर रोड पार करने के लिये कोई जेब्रा क्रॉसिंग नहीं बना है । इस बात की जानकारी नहीं है कि पुलिस ने घटनास्थल को जी.ई. रोड में होना दर्शाया है, साक्षी स्वतः कहता है कि घटना जी.ई.रोड के किनारे घटी थी । यह कहना गलत है कि मोटर सायकल का चालक घटना के समय धीमी एवं सावधानी पूर्वक वाहन चला रहा था । इस साक्षी ने भी इस तथ्य को अस्वीकार किया है कि मृतक द्वारा बिना आगे- पीछे देखे, दौड़कर रोड पार करने के कारण घटना घटित हुई थी तथा घटनास्थल पर यह मौजूद नहीं था । यह अस्वीकार किया है कि सुरेन्द्र यादव के कहे अनुसार बयान दे रहा है ।

13- अनावेदक-पक्ष की ओर से आवेदक साक्षीगण के साक्ष्य से प्रकट होने वाली स्थितियों का उल्लेख करते हुये यह तर्क किया गया है कि मामले में अनावेदक वाहन चालक की उपेक्षा प्रमाणित नहीं होती है, बल्कि मृतक की ही उपक्षा प्रकट होती है । यह तर्क किया गया है कि घटना के समय मृतक सड़क पार कर रहा था एवं घटनास्थल पर कोई भी जेब्रा क्रॉसिंग नहीं था, साथ ही घटनास्थल पर स्ट्रीट लाईट होने का साक्ष्य नहीं है, अर्थात् अंधेरे में सड़क पार करने का कृत्य, स्वयं में मृतक की उपेक्षा को दर्शित करता है, ऐसी स्थिति में अनावेदक की उपेक्षा प्रमाणित नहीं होती है तथा तर्क के दौरान न्याय दृष्टान्त ओरिएण्टल इंश्योरेन्स कम्पनी लिमिटेड विरुद्ध प्रेमलता शुक्ला Oriental Insurance Company Limited Vs Premlata Shukla, 2007(भाग-3) दु.मु.प्र. 154 सुप्रीम कोर्ट पर निर्भरता व्यक्त किया गया है, जिसमें यह ठहराया गया है कि मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के तहत् चालक के पक्ष में उपेक्षा को प्रमाणित किया जाना अनिवार्य है, जिसके अभाव में दावा पोषणीय नहीं होगा । इसके अतिरिक्त, दुर्घटना में मृतक की ही योगदायी-उपेक्षा होने के सन्दर्भ में न्याय दृष्टान्त मंगल प्रसाद विरुद्ध शेरा खान एवं अन्य Mangal Prasad vs Shera Khan and others, 2017(भाग-2) ए.सी.सी.डी. 795 म.प्र.उच्च न्यायालय का अवलम्ब लिया गया है।
14- उपरोक्त तर्कों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाये, तो मामले में अनावेदक क्रमांक-1 वाहन चालक द्वारा इस बिंदु पर स्वयं का परीक्षण नहीं कराया गया है कि उसके द्वारा कोई उपेक्षा नहीं बरती गई थी और वाहन को सावधानीपूर्वक चलाया जा रहा था । मामले में यह अविवादित तथ्य है कि उपरोक्त दुर्घटना के सन्दर्भ में अनावेदक क्रमांक-1 वाहन चालक के विरुद्ध धारा-279, 337 एवं 304 (ए) भा.दं.संहिता के तहत् अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया है एवं दाण्डिक प्रकरण लम्बित है, ऐसी स्थिति में अनावेदक क्रमांक-1 की ओर से साक्ष्य के अभाव में यह प्रमाणित नहीं होता है कि उसके द्वारा उतावलेपन या उपेक्षा से वाहन नहीं चलाया गया था, बल्कि आवेदक की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य से अनावेदक क्रमांक-1 वाहन चालक की उपेक्षा प्रमाणित होती है, ऐसी स्थिति में अनावेदक क्रमांक-1 के उतावलेपन से वाहन चलाकर दुर्घटना कारित करने से मृतक किशनलाल यादव की मृत्यु कारित होना प्रमाणित होता है । तद्नुसार वाद-प्रश्न क्रमांक-1 का निष्कर्ष ’’प्रमाणित’’ में दिया जाता है । चूकि उपरोक्त विवेचना अनुसार मृतक की स्वये की उपेक्षा के सम्बंध में साक्ष्य नहीं है, अतः ’’योगदायी-उपेक्षा’’ भी प्रमाणित नहीं होती है, अतः वाद-प्रश्न क्रमांक-2 का निष्कर्ष भी ’’प्रमाणित नहीं’’ में दिया जाता है ।
।। वाद-प्रश्न क्रमांक-3 पर सकारण निष्कर्ष ।।
15- अनावेदक-पक्ष की ओर से अपने जवाबदावा में किये गये अभिवचन के आधार पर इस वाद-प्रश्न की विरचना की गई है । अनावेदकगण की ओर से उक्त बिंदु पर किसी साक्षी का परीक्षण नहीं कराया गया है । प्रदर्श पी-10 के जप्ती पत्र के अवलोकन से स्पष्ट है कि मोटरसायकल क्रमांक सी.जी.04-सी.एल./5347 तथा अनावेदक क्रमांक-1 वाहन चालक विक्रम सिंह के ड्राईविंग लाईसेंस की जप्ती की गई है, जिसकी म्याद अवधि दिनांक 06-10-2035 तक है । इसी प्रकार वाहन के इंश्योरेन्स के दस्तावेज की भी जप्ती की गई है, जिसकी म्याद अवधि दिनांक 16-09-2016 से 15-09-2017 तक है और दुर्घटना दिनांक 13-03-2017 की है, अर्थात् दुर्घटना दिनांक को वाहन की बीमा पॉलिसी वैध थी । वैसे भी बीमा कम्पनी की ओर से इस तथ्य से भी स्पष्ट इन्कार नहीं किया गया है कि दुर्घटना दिनांक को दुर्घटना कारित मोटर सायकल उनके पास बीमित नहीं थी, ऐसी स्थिति में दस्तावेजों के अभाव में यह स्थापित नहीं होता है कि दुर्घटना दिनांक को अनावेदक क्रमांक-1 द्वारा मोटर सायकल को बीमा शर्तो  के उल्लंघन में चलाया जा रहा था, अतः तद्नुसार वाद-प्रश्न क्रमांक-3 का निष्कर्ष ’’प्रमाणित नहीं’’ में दिया जाता है।
।। वाद-प्रश्न क्रमांक-4 पर सकारण निष्कर्ष  ।।
16- आवेदक सुरेन्द्र यादव (आ.सा-1) ने कथन किया है कि दुर्घटना के समय उनके पिता की आयु 70 वर्ष थी, वे साउथ ईस्टर्न रेल्वे में इलेक्ट्रो ड्राईवर के पद से सेवानिवृत्त हुये थे और उन्हे  प्रतिमाह 29,160/-रुपये पेंशन प्राप्त होता था । पिताजी की मृत्योपरान्त इसकी मॉं के खाते में 20,500/-रुपये पेंशन आता है । आवेदक ने उक्त तथ्यों के समर्थन में मृत्यु प्रमाण-पत्र प्रदर्श पी-20 प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार किशनलाल यादव की मृत्यु दिनांक 13-03-2017 को होना उल्लेखित किया गया है । प्रकरण में संलग्न मर्ग इंटीमेशन, नक्शा पंचायतनामा प्रदर्श पी-6, शव-परीक्षण रिपोर्ट प्रदर्श पी-7 एवं अपराध विवरण प्रदर्श पी-9 में भी मृतक की आयु 70 वर्ष होने का स्पष्ट उल्लेख दर्शित होता है ।
17- आवेदकगण की ओर से मृतक की आय के सन्दर्भ में अन्य कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है कि मृतक सेवानिवृत्ति के उपरान्त किसी प्रकार के आय अर्जित करने वाली व्यवसाय में संलग्न रहकर आय अर्जित करता था, अपितु मृतक कों प्राप्त होने वाली पेंशन को ही आय होना व्यक्त किया गया है एवं मृतक की मृत्यु से उसके परिवार कों पेंशन की राशि में से होने वाली क्षति कों आश्रितता की क्षति बताया गया है एवं तद्नुसार आश्रितता की हानि के मद में क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का निवेदन किया गया है । अनावेदक क्रमांक-3 बीमा कम्पनी की ओर से तर्क किया गया है कि पेंशन की राशि कों आय की श्रेणी में नही  रखा जा सकता है, अतः आवेदकगण की आय शून्य मानी जायेगी तथा किसी भी प्रकार की आश्रितता की क्षति, मामले में प्रमाणित नहीं होती है, अतः आवेदकगण, आश्रितता के मद में क्षतिपूर्ति पाने के अधिकारी नहीं हैं ।

18- तत्सम्बंध में विचार किया गया । यह स्पष्ट है कि मृतक वर्ष 2002 में साउथ ईस्टर्न रेल्वे से सेवानिवृत्त हुये थे और पेंशन प्राप्त करते थे । आवेदक साक्षी क्रमांक-3 प्रबोध बंसोड़ के साक्ष्य के अनुसार मृतक का पेंशन खाता सम्बंधी एकाउण्ट स्टेटमेंट दिनांक 01-01-2017 से 01-03-2017 प्रदर्श पी-23 के अनुसार मृतक को 27,587/-रुपये दिनांक 30-01-2017 को एवं 27,588/-रुपये फरवरी, 2017 का पेंशन दिया गया है । उनकी मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नी श्रीमती शांतिदेवी यादव को रेल्वे से पेंशन प्राप्त हो रही है, तत्सम्बंध में प्रदर्श पी-24 का दस्तावेज पेश  किया गया है, जिसके अनुसार मृतक की पत्नी श्रीमती शांति देवी यादव को 20,906/- रुपये पेंशन प्राप्त हो रहा है ।
19- आवेदक-पक्ष की ओर से यह तर्क किया गया है कि दुर्घटना में मृतक की मृत्यु होने के कारण उसके परिवार कों प्राप्त होने वाली पेंशन की राशि 27,588/ रुपये में से कम होकर 20,906/-रुपये हो गया है, जिससे परिवार को लगभग 14,224/-रुपये की क्षति हुई है, अतः उक्त क्षति के आधार पर गुणक लगाकर क्षतिपूर्ति राशि निर्धारित की जावे ।
20- उक्त तर्क पर विचार किया गया । इस बिंदु पर आवेदकगण की ओर से न्याय दृष्टान्त तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम लिमिटेड विरुद्ध बी.वेंकटराघवन एवं अन्य Tamil Nadu State Transport Corporation Limited vs. B. Venkataraghavan and others, 2018 (भाग-1) ए.सी.सी.डी. 33 (मद्रास) तथा बीणापाणि घोष एवं अन्य विरुद्ध न्यू इण्डिया इंश्योरेंन्स कम्पनी लिमिटेड एवं अन्य New India Insurance Company Limited and others against Binapani Ghosh and others, 2014 (भाग-1) ए.सी.सी.डी. 322 (कलकत्ता) का अवलम्ब लिया गया है, जिसमें मृतक को प्राप्त होने वाली पेंशन की राशि कों उसकी आय होना मान्य किया गया है । उपरोक्त अभिमत के प्रतिकूल बीमा कम्पनी की ओर से कोई न्याय दृष्टान्त पेश नहीं किया गया है, अतः वर्तमान मामले में भी मृतक की पेंशन राशि को आश्रितता की हानि की गणना हेतु आय के रूप में स्वीकार किया जाना उपयुक्त पाया जाता है ।
21- आवेदक साक्ष्य के अनुसार मृतक की माह फरवरी, 2017 की पेंशन 27,588/-रुपये थी, जिसे उसकी आय के रूप में स्वीकार किया जाता है तथा चूंकि वर्तमान मामले में आवेदक क्रमांक-2 से 5 वयस्क हैं एवं उन्हें मृतक पर आश्रित नहीं माना जा सकता, अतः मात्र आवेदिका क्रमांक-1 को मृतक पर आश्रित होना पाते हुये मृतक की आय में से स्वयं के व्यय के लिये 1/2 भाग की कटौती किये जाने पर परिवार को प्रदान की जाने वाली राशि 13,794/-रुपये निर्धारित की जाती है । अतः मृतक की वार्षिक आश्रितता की राशि 1,65,528/-रुपये निर्धारित की जाती है ।
चूंकि मृतक की आयु 70 वर्ष थी एवं न्याय दृष्टान्त नेशनल इंश्योरेन्स कम्पनी  विरुद्ध प्रणय शेट्टी National Insurance Company Vs Prannoy Shetty, जे.टी. 2017(भाग-10) सुप्रीम कोर्ट-450 में ठहराये गये विधि सिद्धान्त के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के सम्बंध में किसी प्रकार के भविष्य की आय में वृद्धि हेतु कोई व्यवस्था नहीं दी गई है, अतः वर्तमान मामले में भविष्यवर्ती आय में वृद्धि लागू किये जाने का कोई आधार नहीं है ।
22- न्याय दृष्टान्त श्रीमती सरला वर्मा विरुद्ध दिल्ली ट्रांसपोर्ट निगम Smt Sarla Verma Vs Delhi Transport Corporation, ए.आईआर. 2009 (सु.को.) 3104 के परिप्रेक्ष्य में गुणक के निर्धारण के लिये मृतक की आयु
महत्वपूर्ण कारक है । अनावेदक बीमा कम्पनी की ओर से यह तर्क किया गया है कि आवेदक साक्षी के अनुसार मृतक वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुआ था तथा दुर्घटना दिनांक 13-03-2017 की है, अर्थात् मृतक लगभग 15 वर्ष से सेवानिवृत्त था तथा मृतक की सेवानिवृत्ति आयु यदि 58 वर्ष भी मानी जाये, तो दुर्घटना दिनांक को मृतक की वर्तमान आयु 72 वर्ष होती है एवं श्रीमती सरला वर्मा के प्रकरण में 72 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के लिये कोई गुणांक निर्धारित नहीं किया गया है । तत्सम्बंध में विचार किया गया । आवेदकगण द्वारा मृतक की आयु 70 वर्ष बतायी गई है, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मृतक की आयु 70 वर्ष बतायी गई है तथा मृतक की जन्मतिथि के सम्बंध में कोई साक्ष्य नहीं है एवं यह अनावेदक-पक्ष पर प्रमाण-भार था कि वह, यह स्थापित करे कि मृतक की आयु 70 वर्ष से अधिक थी । अनावेदक की ओर से मात्र सेवानिवृत्ति तिथि से मृत्यु की तिथि की अवधि के आधार पर मृतक की आयु 70 वर्ष से अधिक माने जाने का तर्क किया गया है, किन्तु उक्त तर्क, साक्ष्य के अभाव में स्वीकार योग्य नहीं हो सकती है, क्योंकि सेवानिवृत्ति सम्पूर्ण सेवाकाल की अवधि के उपरान्त भी दिया जा सकता है, अथवा सम्पूर्ण सेवा अवधि पूर्ण होने से पहले भी कर्मचारी को सेवानिवृत्त किया जा सकता है । अतः मामले में, अनावेदक- पक्ष का तर्क, मृतक की आयु के निर्धारण के लिये स्वीकार योग्य नहीं है । तद्नुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर दुर्घटना दिनांक कों मृतक की आयु 70 वर्ष होना निर्धारित किया जाता है एवं मृतक की आयु के आधार पर वर्तमान मामले में 05 का गुणांक लागू किये जाने योग्य है ।
23- अतः आवेदकगण की आश्रितता की राशि 1,65,528/-रुपये वार्षिक लिये जाने पर 05 का गुणक लागू किये जाने पर आश्रितता की कुल राशि 8,27,640/- रुपये निर्धारित की जाती है । इसके अतिरिक्त न्याय दृष्टान्त नेशनल
इंश्योरेन्स कम्पनी विरुद्ध प्रणय शेट्टी, जे.टी. 2017(भाग-10) सुप्रीम कोर्ट-450 में प्रतिपादित विधिक सिद्धान्तों के अनुसार आवेदकगण को सम्पदा की हानि के मद में 15,000/-रुपये, प्रेम एवं स्नेह की हानि के मद में 40,000/-रुपये तथा अंत्येष्टि व्यय के मद में 15,000/-रुपये दिलाया जाना उचित प्रतीत होता है । इस प्रकार आवेदकगण कुल 8,97,640/- रुपये बतौर क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने के अधिकारी होना पाया जाता है ।
24- जहां तक क्षतिपूर्ति की अदायगी के उत्तरदायित्व का सम्बंध है, अनावेदक क्रमांक-3 यह प्रमाणित करने में विफल रहा है कि अनावेदक क्रमांक-1 व 2 के द्वारा दुर्घटना दिनांक कों दुर्घटनाकारित वाहन को बीमा की शर्तां के उल्लंघन में चलाया जा रहा था । चूंकि अनावेदक क्रमांक-1 व 2 दुर्घटनाकारित वाहन के क्रमशः चालक व पंजीकृत स्वामी हैं तथा वाहन अनावेदक क्रमांक-3 के पास बीमित थी, अतः ’’आवेदकगण, अनावेदक क्रमांक-1 से 3 से संयुक्त एवं पृथक्-पृथक् रूप से 8,97,640/-रुपये क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के अधिकारी हैं’’, के रूप में इस वाद-प्रश्न कों निराकृत किया जाता है ।

25- चूंकि आवेदक क्रमाक-1 मृतक की पत्नी है तथा आवेदक क्रमांक-2 से 5 मृतक के वयस्क पुत्र हैं तथा मृतक पर आश्रित नहीं थे, अतः आवेदक क्रमांक-2 से 5 कों क्षतिपूर्ति प्राप्त किये जाने के अधिकारी नहीं पाये जाते हैं । तद्नुसार मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुये मृतक की पत्नी आवेदिका क्रमांक-1 श्रीमती शांति देवी कों ही 8,97,640/-रुपये क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने की अधिकारी होना ठहराया जाता है ।
।। वाद-प्रश्न क्रमांक-5: सहायता एवं व्यय ।।
26- उपरोक्त साक्ष्य-विवेचना के आधार पर आवेदकगण अपना दावा आंशिक रूप से प्रमाणित करने में सफल रहे हैं, अतः आवेदकगण की ओर से प्रस्तुत दावा आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न आशय का अधिनिर्णय पारित किया जाता है:-
1. अनावेदक क्रमांक-1 से 3 संयुक्त एवं पृथक्-पृथक् रूप से आवेदकगण को 8,97,640/-(आठ लाख सन्तानबे हजार छः सौ चालीस) रुपये अधिनिर्णय दिनांक से एक माह के भीतर अधिकरण के माध्यम से प्रदान करेंगे ।
2. अनावेदकगण, आवेदकगण को उपरोक्त राशि पर आवेदन प्रस्तुति दिनांक 18-05-2017 से सम्पूर्ण रकम की अदायगी दिनांक तक 06 प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज भी अदा करेंगे ।
3. आवेदिका क्रमांक-1 ने यदि अंतरिम क्षतिपूर्ति प्राप्त किया हो, तो उक्त राशि अवार्ड की मूल राशि में समायोजित किया जावे।
4. आवेदिका क्रमांक-1 श्रीमती शांति देवी को प्राप्त होने वाली राशि में से उसे 1,00,000/-रुपये नगद प्रदान किया जाकर शेष राशि को उसके नाम से तीन वर्ष की अवधि के लिये किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा योजना के तहत् जमा किया जावेगा, जिस पर वह किसी भी प्रकार की अग्रिम अथवा लोन की सुविधा प्राप्त नहीं कर सकेगी तथा परिपक्वता अवधि पूर्ण होने पर सम्पूर्ण राशि वे स्वयं प्राप्त कर सकेंगी।
5. अधिवक्ता-शुल्क प्रमाणित होने पर 1,000/-(एक हजार) रुपये
निर्धारित किया जाता है ।
........... तद्नुसार व्यय-तालिका बनाई जावे ।
 सही/-
दिनांक: 06 अगस्त, 2019
(अजीत कुमार राजभानू)
 प्रथम अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण
 दुर्ग (छ.ग.)

Bail Case : दिलीप कुमार साहू विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन

B.A.No. 881/2019 (Cr.No.48/2019, Mahila Thana Durg)
न्यायालय: अजीत कुमार राजभानू, प्रथम अति. सत्र न्यायाधीश, दुर्ग (छ.ग.)
Court: Ajit Kumar Rajbhanu, First High. Sessions Judge, Durg (Chhattisgarh)
जमानत आवेदन Bail application क्रमांक-881/2019
----------------------------------------
 दिलीप कुमार साहू आत्मज कृपाराम साहू उम्र 32 वर्ष, निवासी: इंदिरा चौक, संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर, जिला रायपुर (छ.ग.)
।। विरुद्ध ।।
छत्तीसगढ़ शासन, द्वारा: थाना प्रभारी महिला थाना दुर्ग (छ.ग.)
----------------------------------------
07-08-2019 यह जमानत आवेदन माननीय सत्र न्यायाधीश Session judge के न्यायालय से अन्तरण पर प्राप्त।
----------------------------------------
आवेदक/आरोपी दिलीप कुमार साहू Applicant / accused Dilip Kumar Sahu की ओर से श्री संतोष वर्मा, अधिवक्ता Shri Santosh Verma, Advocate उपस्थित ।
अनावेदक/राज्य Non-Applicant State द्वारा सुश्री फरिहा अमीन, अपर लोक अभियोजक Ms. Fariha Amin, Additional Public Prosecutor उपस्थित ।
1- आवेदक/आरोपी की ओर से अग्रिम जमानत हेतु प्रस्तुत आवेदन-पत्र, अंतर्गत धारा-438 दण्ड प्रक्रिया संहिता Section-438 Code of Criminal Procedure पर सुना गया ।
2- संक्षेप में आवेदन-पत्र इस प्रकार है कि प्रार्थिया मंजूलता साहू Manjulata Sahu द्वारा की गई शिकायत के आधार पर महिला थाना, दुर्ग द्वारा आवेदक सहित उसके माता-पिता एवं बहनों के विरुद्ध भा.दं.संहिता की धारा-498/34 Section-498/34 of Indian Penal Code के तहत् अपराध पंजीबद्ध किये जाने की उसे जानकारी हुई है । आवेदक का विवाह प्रार्थिया मंजूलता साहू के साथ सामाजिक रीति-रिवाज के अनुसार ग्राम जेवरा-सिरसा, जिला दुर्ग में दिनांक 10-02-2017 को सम्पन्न हुआ था । विवाह के कुछ दिन बाद से ही प्रार्थिया अपने पति अर्थात् आवेदक को उसके माता-पिता से अलग रहने के लिये लगातार दबाव बनाती रही है, जिससे इन्कार करने पर विवाह के लगभग तीन माह बाद अपने पिता होरीलाल कों फोन करके बुलाकर जब आवेदक अपने कार्य से बाहर था, तब पति की बगैर सहमति एवं जानकारी के अपने पति का घर छोड़कर मायके चली गयी थी । आवेदक ने प्रार्थिया को ससम्मान अच्छे से रखने का कई प्रयास किया, किन्तु प्रार्थिया की हठधर्मिता के कारण ही दोनों एक साथ निवासरत नहीं हैं । आवेदक द्वारा प्रदेश साहू संघ, रायपुर Pradesh Sahu Sangh, Raipur में दिनांक 08-10-2018 को की गई शिकायत पर समाज के व्यक्तियों द्वारा प्रार्थिया को समझाईश देते हुये अपने पति के साथ रहने का सुझाव दिया गया था । प्रार्थिया द्वारा दिनांक 25-11- 2017 को पुत्री को जन्म देने के पश्चात् से ही लगातार आवेदक को उसके माता-पिता से अलग किराये के मकान में रहने हेतु दबाव बनाती रही और अपने इरादा में सफल नहीं हो सकी, तो उसने झूठी शिकायत की है । आवेदक एक शिक्षित एवं सामाजिक व्यक्ति है, समाज में उसकी काफी मान-सम्मान एवं प्रतिष्ठा है, उक्त अपराध में आवेदक को गिरफ्तार किये जाने की दशा में आवेदक का मान-सम्मान प्रभावित होगा । आवेदक, रायपुर जिले का मूल निवासी है, जमानत पर छूटने के पश्चात् अन्यत्र भागने अथवा फरार होने की सम्भावना नहीं है, न्यायालय द्वारा अधिरोपित सभी शर्तों का पालन करने के लिये तैयार है । प्रकरण के अन्य आरोपियों को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा अग्रिम जमानत Anticipatory bail का लाभ प्रदान किया गया है, अतः आवेदक को भी अग्रिम जमानत पर छोड़ दिया जावे।
3- आवेदन-पत्र की कंडिका-11 में यह भी उल्लेख किया गया है कि अग्रिम जमानत हेतु यह प्रथम आवेदन-पत्र first application for anticipatory bail है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई जमानत आवेदन-पत्र किसी सक्षम न्यायालय अथवा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष न तो लम्बित है और न ही निरस्त किया गया है । आवेदन के समर्थन में आवेदक द्वारा स्वयं का शपथ-पत्र Own affidavit प्रस्तुत किया गया है ।
4- राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया है ।
5- आवेदक/आरोपी की ओर से अग्रिम जमानत हेतु प्रस्तुत आवेदन-पत्र के परिप्रेक्ष्य में महिला थाना, दुर्ग के अपराध क्रमांक-48/2019, अंतर्गत धारा-498(ए)/34 भा.दं. संहिता, सहपठित धारा-4 दहेज प्रतिषेध अधिनियम Section-4 Dowry Prohibition Act की पुलिस केस डायरी तथा आवेदकगण की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन किया गया ।
6- केस डायरी के अनुसार प्रार्थिया श्रीमती नम्रता उर्फ मंजूलता साहू द्वारा इस आशय का लिखित शिकायत Written complaint प्रस्तुत किया गया है कि दिलीप साहू के साथ उसका विवाह हिन्दू रीति -रिवाज के अनुसार दिनांक 01-02-2017 को सम्पन्न हुआ था। विवाह के उपरान्त उसके सास-ससुर द्वारा कहा गया कि उनका इकलौता बेटा है, शिक्षक होते हुये भी उनके सोचे अनुसार दहेज नहीं दिये । उसके पति की बहनें एक राय होकर मीटिंग करते और इसके पति को कहते थे कि तुम गलत जगह विवाह कर लिये हो, तुम्हारा बाप दहेज में गाड़ी नहीं दिया है । इसे टोनही Tonahi कहकर प्रताडि़त करते हैं और सास ने कोटनी के पांच तांत्रिक कों बुलाकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताडि़त किया है। उसके पति द्वारा कहा गया कि सभी ने इसे टोनही कहा है, इसलिये दाम्पत्य सम्बंधों Marriage relationship का निर्वहन नहीं कर सकता। दिनांक 25-11-2017 को पुत्री का जन्म हुआ, जिसमें डिलीवरी का सारा खर्च इसके पिता द्वारा उठाया गया । इसके सास, ससुर एवं ननद द्वारा कहा गया कि 5,00,000/-रुपये तथा कार कोई बड़ी चीज नहीं है, कार व नगद 5,00,000/-रुपये लाकर दो, तो तुम्हारी लड़की को साथ में रखेंगे, अन्यथा भूल जावो। अक्टूबर, 2018 में यह अपनी बच्ची तथा पिता, भाई, मामा एवं नाना सहित समाज के लोगों के साथ ससुराल गयी, तो इसकी सास ने घर के अन्दर ताला लगाकर प्रवेश देने से मना कर दी। उपरोक्तानुसार की गई रिपोर्ट के आधार पर आवेदकगण के विरुद्ध अपराध पंजीबद्ध किया जाकर अन्वेषण investigation किया जा रहा है।
7- विचार किया गया । केस डायरी के अनुसार प्रार्थिया द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट First Information Report दिनांक 10-07-2019 को काउंसिलिंग की कार्यवाही के उपरान्त दर्ज करायी गई है । काउंसिलिंग की रिपोर्ट आवेदकगण की ओर से संलग्न की गई है, जिसमें उभय-पक्षों के द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप किये गये हैं । प्रार्थिया द्वारा दहेज एवं मानसिक प्रताड़ना की बात बतायी गई है, जबकि अनावेदक पति ने प्रार्थिया को सास-ससुर से अलग रहने के लिये दबाव डालने तथा इकलौता पुत्र होने से मॉ-बाप को छोड़ने में असमर्थता व्यक्त किया है तथा प्रार्थिया द्वारा भी सास-ससुर से दुर्व्यवहार करने की बात बताया है । मामले में, धारा-498 (ए) भा.दं.संहिता के तहत् अन्वेषण किया जा रहा है । वर्तमान मामले में अन्य आरोपीगण कृपाराम साहू Kriparam Sahu, जो आवेदक/आरोपी के पिता हैं, कौशिल्या साहू Kaushilya Sahu, जो आरोपी की माता है, लता साहू एवं शैलेन्द्री साहू Lata Sahu and Shailendri Sahu, जो आरोपी की बहनें हैं, को पूर्व में इस न्यायालय द्वारा जमानत याचिका क्रमांक 800/2019 में पारित आदेश दिनांक 23-07-2019 एवं जमानत याचिका क्रमांक 823/2019 में पारित आदेश दिनांक 26-07-2019 के अनुसार केस डायरी में उक्त आरोपीगण के विरुद्ध संकलित सामग्री के आधार पर अग्रिम जमानत का लाभ प्रदान किया गया है।

8- किन्तु वर्तमान आवेदक/आरोपी दिलीप कुमार, प्रार्थिया का पति है तथा पत्नी के प्रति पति का, अन्य रिश्तेदारों की अपेक्षा अधिक जिम्मेदारी रहती है कि वह अपनी पत्नी के प्रति उचित व्यवहार करे तथा वर्तमान मामले में आवेदक/आरोपी पति के विरुद्ध प्रार्थिया को प्रताड़ित करने के सम्बंध में जो सामग्री उपलब्ध है, वह अन्य आरोपीगण की अपेक्षा गम्भीर है तथा अन्य आरोपीगण को अग्रिम जमानत का लाभ प्राप्त होने के आधार पर आवेदक/आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ प्रदान किये जाने हेतु समरूप मामला प्रकट नहीं होता है । अतः आवेदक/आरोपी दिलीप कुमार साहू, जो प्रार्थिया का पति है, के विरुद्ध संकलित साक्ष्य को देखते हुये उसे अग्रिम जमानत Anticipatory bail का लाभ प्रदान किये जाने हेतु उचित मामला निर्मित नहीं होता है, अतः आवेदक/आरोपी दिलीप कुमार साहू की ओर से अग्रिम जमानत हेतु प्रस्तुत आवेदन, अंतर्गत धारा-438 दं.प्र.संहिता, निरस्त किया जाता है ।

9- आदेश की प्रति के साथ पुलिस केस डायरी वापस हो तथा आदेश की एक प्रति, प्रकरण के विचारण का क्षेत्राधिकार रखने वाले सम्बंधित न्यायालय को सूचनार्थ प्रेषित किया जावे ।
10- जमानत प्रकरण का परिणाम दर्ज कर प्रकरण अभिलेखागार भेजा जावे ।
सही/-
(अजीत कुमार राजभानू)
प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश
दुर्ग (छ.ग.)

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Aanand Math Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Ajeet Kumar Rajbhanu Anticipatory bail Arun Thakur Awdhesh Singh Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara Durg H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH Kauhi Lalit Joshi Mandir Trust Motor accident claim News Patan Rajkumar Rastogi Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Sarvarakar SC Shayara Bano Smita Ratnavat Temporary injunction Varsha Dongre VHP अजीत कुमार राजभानू अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दिलीप सुखदेव दुर्ग न्‍यायालय देवा देवांगन नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रफुल्ल सोनवानी प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर रेवा खरे श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा स्मिता रत्नावत हरे कृष्ण तिवारी