Tuesday, 27 September 2016

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005

 

यह अधिनियम महिलाओं के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया है। इस अधिनियम के पारित करने का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाना व उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है।
घरेलू हिंसा क्या है?
इस अधिनियम के अनुसार घरेलू हिंसा सम्बन्ध-प्रतिवादी के किसी कार्य, लोप या आचरण से है जिससे व्यथित व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन या किसी अंग को हानि या नुकसान हो। इसमें शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न, लैगिंक, शोषण, मौखिक और भावनात्मक शोषण व आर्थिक उत्पीड़न शामिल है। व्यथित व्यक्ति और उसके किसी सम्बन्धी को दहेज, या किसी अन्य सम्पत्ति की मॉंग के लिए हानि या नुकसान पहुॅंचाना भी इसके अंतर्गत आता है।
शारीरिक उत्पीड़न - का अर्थ है ऐसा कार्य जिससे व्यथित व्यक्ति को शारीरिक हानि, दर्द हो या उसके जीवन स्वास्थ्य एवं अंग को खतरा हो।
से तात्पर्य है महिला को अपमानित करना, हीन समझना, उसकी गरिमा को ठेस पहुॅंचाना आदि।
मौखिक और भावनात्मक उत्पीड़न - महिला को अपमानित करना, बच्चा न होने, व लड़का पैदा न होने पर ताने मारना आदि और महिला के किसी सम्बन्धी को मारने पीटने की धमकी देना।
आर्थिक उत्पीड़न - का मतलब है महिला को किसी आर्थिक एवं वित्तीय साधन जिसकी वह हकदार है, उससे वंचित करना, स्त्रीधन व कोई भी सम्पत्ति जिसकी वह अकेली अथवा किसी अन्य व्यक्ति के साथ हकदार हो, आदि को महिला को न देना या उस सम्पत्ति को उसकी सहमति के बिना बेच देना आदि आर्थिक उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं।
उपरोक्त सभी कृत्यों को घरेलू हिंसा माना गया है।
इस अधिनियम के अंतर्गत केवल पत्नी ही नही बल्कि बहन, विधवा, मॉं अथवा परिवार के किसी भी सदस्य पर शारीरिक, मानसिक, लैगिंक, भावनात्मक एवं आर्थिक उत्पनीड़न को घरेलू हिंसा माना गया है।
इस अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित परिभाषाएं भी दी गयी है-
पीड़ित व्यक्ति - ऐसी कोई महिला जिसका प्रतिवादी से पारिवारिक सम्बन्ध हो या रह चुका हो और जिसको किसी प्रकार की घरेलू हिंसा से प्रताड़ित किया जाता हो।
घरेलू हिंसा की रिपोर्ट - इसका अर्थ है वह रिपोर्ट जो पीड़ित व्यक्ति द्वारा घरेलू हिंसा की सूचना देने पर एक विहित प्रारूप में तैयार की जाती है।
घरेलू सम्बन्ध - दो व्यक्ति जो साथ रहते हों या कभी गृहस्थी में एक साथ रहे हों या सम्बन्ध सगोत्रता, विवाह या गोद लिए जाने के द्वारा या परिवार के सदस्यों का संयुक्त परिवार में रहने से हो सकता है, उसको घरेलू हिंसा कहते हैं।
गृहस्थी में हिस्सा - इसका अर्थ है जहॉं पर व्यथित व्यक्ति घरेलू सम्बन्ध के द्वारा अकेले या प्रतिवादी के साथ रहता है या रहता था। इसके अंतर्गत वह घर जो कि संयुक्त रूप से व्यथित व्यक्ति या प्रतिवादी का हो या किराए पर हो, या दोनो का या किसी एक पक्ष का उसमें कोई अधिकार, हक, हित, और ऐसा घर जो प्रतिवादी के संयुक्त परिवार का हो, चाहे उसमें प्रतिवादी और व्यथित व्यक्ति का कोई अधिकार, हक, हित हो या न हो।
संरक्षण अधिकारी - इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार हर जिले में एक या जितने वह उचित समझे संरक्षण अधिकारी नियुक्त करेगी, जो इस अधिनियम के अनुसार कर्तव्यों का पालन करेगा। जहॉं तक हो सके वह अधिकारी महिला होनी चाहिए।
सेवा प्रदान करने वाली सस्थाएं (सर्विस प्रोवाइडर) - इस अधिनियम के अंतर्गत स्वैच्छिक संस्थाएं जो सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) अधिनियम, या कम्पनीज अधिनियम अथवा किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत रजिस्टर्ड हों, और जिनका उद्देश्य महिलाओं के अधिकार, उनके हित की रक्षा करना होगा तभी वह इस अधिनियम के अंतर्गत सेवा सुविधा उपलब्ध कराने योग्य समझे जाएंगे।
शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया - घरेलू हिंसा का शिकार हो रही महिला या संरक्षण अधिकारी या जो व्यक्ति इस प्रकार की गतिविधियों को देख रहा है, मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकता है।
- आवेदन पत्र मिलने के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा सुनवाई की तारीख घोषित की जायेगी जो आवेदन पत्र मिलने के तीन दिन के भीतर हो सकती है।
- प्रार्थना पत्र का फैसला मजिस्ट्रेट द्वारा 60 दिन के अंदर कर दिया जायेगा। मजिस्ट्रेट सुनवाई की तारीख संरक्षण अधिकारी को देगा।
- इसके बाद संरक्षण अधिकारी प्रतिवादियों को सुनवाई की तारीख की सूचना दो दिनों के अंदर या मजिस्ट्रेट के आदेशानुसार देगा।
- ऐसे मामलों की सुनवाई इन कैमरा (बन्द न्यायालय) में भी की जायेगी।
अधिनियम के अंतर्गत दिए जाने वाले आदेश-
1. संरक्षण से संबंन्धित आदेश
अगर मजिस्ट्रेट को यह लगता है कि किसी जगह हिंसा की घटना घटित हुई है तो वह प्रतिवादी पर निम्नलिखित प्रतिबन्ध लगा सकता है:-
- किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा की घटना करने से या उसमें मदद करने से।
- उस स्थान में प्रवेश करने से जिसमें व्यथित महिला निवास कर रही हो। और व्यथित व्यक्ति यदि कोई बच्चा है तो उसके स्कूल में प्रवेश करने से।
- व्यथित व्यक्ति से किसी भी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करने जैसे बातचीत, पत्र या टेलीफोन आदि।
- प्रतिवादी को अपनी सम्पत्ति या संयुक्त सम्पत्ति को बेचने से और बैंक लॉंकर, खाते आदि जो संयुक्त या निजी हो उसके प्रयोग से भी रोका जा सकता है। महिला पर आश्रित उसके सम्बन्धियों व पीड़ित महिला की सहायता करने वाले व्यक्तियों के विरूद्ध किसी भी प्रकार की हिंसा करने से भी रोंका जा सकता है।
2. निवास स्थान संबंधी आदेश आवेदनपत्र मिलने पर यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि महिला घरेलू हिंसा का शिकार है तो प्रतिवादी के विरूद्ध निम्नलिखित आदेश पारित कर सकता है:-
- जिस घर में महिला निवास कर रही है प्रतिवादी उसे वहॉं से नहीं निकाले।
- प्रतिवादी और उसके किसी रिश्तेदार को महिला के निवास स्थान में घुसने से रोका जा सकता है।
- प्रतिवादी को उस घर को बेचने या किसी को देने से भी रोका जा सकता है।
- प्रतिवादी को पीड़ित महिला के लिए अलग से घर की व्यवस्था करने, उसका किराया देने आदि का भी आदेश दिया जा सकता है।
- पीड़ित व बच्चे की सुरक्षा के लिए मजिस्ट्रेट जो उचित समझे प्रतिवादी को आदेश दे सकता है।
- मजिस्ट्रेट प्रतिवादी को पीड़ित महिला का स्त्रीधन, अन्य सम्पत्ति वापस करने का आदेश भी दे सकता है।
3. अभिरक्षा संबंधी आदेश
मजिस्ट्रेट संरक्षण या अन्य राहत के लिए दिए गए आवेदन की सुनवाई के समय पीड़ित व्यक्ति को अपने बच्चों को अस्थाई रूप से अपने पास रखने का भी आदेश दे सकता है। प्रतिवादी को बच्चों से मिलने से भी रोका जा सकता है, यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि यह बच्चों के हित में नही है।
4. आर्थिक राहत
मजिस्ट्रेट ऐसे मामलों में आर्थिक राहत के आदेश भी दे सकता है जिससे व्यथित व्यक्ति अपना व अपने बच्चे का खर्च पूरा कर सके और ऐसी आर्थक राहत में कई चीजें सम्मिलित हो सकती है। जैसे:- 1- आय का नुकसान। 2- चिकित्सी य खर्च।
3- किसी सम्पत्ति जिस पर व्यथित व्यक्ति का नियंत्रण हो, उसका नुकसान, बर्बादी या उस सम्पत्ति से उसे निकाल देने का हर्जाना और, 4- भरण पोंषण के लिए आदेश।
ऐसी आर्थिक राहत मजिस्ट्रेट एक मुश्त या मासिक किस्त के रूप में देने का आदेश पारित कर सकता है।
5. मुआवजे से संबंधी आदेश-
मजिस्ट्रेट इस अधिनियम में दी गई राहत के अलावा प्रतिवादी को पीड़ित व्यक्ति को हुई मानसिक, भावनात्मक पीड़ा के लिए भी मुआवजे का आदेश दे सकता है।
6. सलाह और विशेषज्ञ की मद्द
मजिस्ट्रेट एक पक्ष के लिए या दोनो पक्षों के लिए सलाह के आदेश दे सकता है। सहायता के लिए किसी विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।
अन्य आदेश:-
  • मजिस्ट्रेट प्रतिवादी को उत्पीड़ित महिला को अर्थिक सहायता देने का आदेश दे सकता है।
  • यदि मजिस्ट्रेट को आवेदन पत्र मिलने पर यह लगता है कि महिला घरेलू हिंसा से पीड़ित है तो वह प्रतिवादी की अनुपस्थित में उसके विरूद्ध आदेश पारित कर सकता है।
  • मजिस्ट्रेट अंतरिम आदेश भी पारित कर सकता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत दिए गये आदेश की निःशुल्क कापी दोनो पक्षों, संबंधित पुलिस अधिकारी, सहायता प्रदान कराने वाले संगठन जो न्यायालय के क्षेत्राधिकार में हो, तथा घरेलू हिंसा के बारे में जानकारी देने वाले संगठन को दी जाएगी।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाली राहत के अलावा या इसके साथ पीड़ित महिला प्रतिवादी के विरूद्ध दीवानी न्यायालय, पारिवारिक या अपराधिक न्यायालय में भी वाद दायर कर सकती है।
  • राज्य सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत आश्रयगृह अधिसूचित करेगी।
  • पीड़ित महिला ऐसे आश्रय गृहों में भी आश्रय ले सकती है। ऐसे आश्रय गृहों के संचालकों का दायित्व है कि वह पीड़ित महिला को आश्रय दे।
  • पीड़ित महिलाओं को चिकित्सीय सुविधा का भी अधिकार है। प्रत्येक चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह उन्हें जरूरी चिकित्सीय सुविधा प्रदान करें।

संरक्षण अधिकारी के कर्तव्यः-
1- इस अधिनियम में दिये गये मजिस्ट्रेट के कार्यों को पूरा करने में उसकी मदद करें।
2- घरेलू हिंसा की शिकायत मिलने पर एक घरेलू घटना रिपोर्ट करे। संरक्षण अधिकारी यह रिपोर्ट मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी को देगा।
3- उत्पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण, 1987 के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सेवा उपलब्ध कराएगा।
4- उन सभी गैर सरकारी संस्थानों की सूची तैयार करेगा जो पीड़ित को निःशुल्क विधिक सेवा, निःशुल्क चिकित्सा सेवा तथा आश्रय गृह उपलब्ध कराते हैं।
5- पीड़ित व्यक्ति को सुरक्षित आश्रय गृह प्राप्त करवाना और जरूरत हो तो ऐसा करने की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन एवं मजिस्ट्रेट जिसके क्षेत्राधिकारी में ऐसा आश्रयगृह है उनको देगा।
6- पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सीय जॉंच करावाएगा और जॉंच रिपोर्ट पुलिस थाने में मजिस्ट्रेट को देगा।
सरकार के कर्तव्य:-
इस अधिनियम के अंतर्गत केन्द्रीय और राज्य सरकार के निम्नलिखित कर्तव्य है:-
1- अधिनियम के बारे में लोगों को जागरूक करना।
2- सम्बन्धित अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करना।
3- विभिन्न विभागों जैसे विधि मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय व
संबंधित विभागों के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
4- उन सभी गैर सरकारी संस्थानों की सूची तैयार करेगा जो पीड़ित को निःशुल्क विधिक सेवा, निःशुल्क चिकित्सा सेवा तथा आश्रय गृह उपलब्ध कराते हैं।
सेवा प्रदान करने वाली संस्थाओं (सर्विस प्रोवाइडर) के कर्तव्य:-
- पीड़ित व्यक्ति के कहने पर घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट तैयार करना व उस क्षेत्र के संरक्षण अधिकारी व मजिस्ट्रेट को भेजना।
- पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सीय जॉंच करवाना व उसकी रिपोर्ट संरक्षण अधिकारी, व क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में देना।
- पीड़ित व्यक्ति के कहने पर उसे आश्रयगृह में आश्रय प्रदान करवाना व ऐसे आश्रय गृहों की रिपोर्ट संम्बधित पुलिस स्टेशन में देना।
इस अधिनियम के अन्तर्गत जारी किये गये आदेशों की पूर्ति न करने पर निम्नलिखित दण्ड का प्रावधान है:-
ऐसे में प्रतिवादी को अधिकतम एक वर्ष की जेल अथवा 20,000 रू. का जुर्माना या दोनो हो सकते हैं।
भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 498-ए या दहेज निषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत आरोप लगाया जा सकता है।
संरक्षण अधिकारी द्वारा कर्तव्यों की पूर्ति न करने पर ऐसे संरक्षण अधिकारी को अधिकतम एक वर्ष की जेल या 20000 रूपये जुर्माना या दोनो हो सकते हैं।
शिकायत कहॉं दर्ज करा सकते है:-
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जिसके क्षेत्राधिकार में-
1- पीड़ित महिला जहॉ स्थायी या अस्थायी रूप से रह रही हो या व्यवसाय अथवा नौकरी करती हो। या
2- प्रतिवादी जहॉं रह रहा हो या व्यवसाय या नौकरी कर रहा हो। या 3- जहॉं पर विवाद का कारण उत्पन्न हुआ हो।
इस अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट संरक्षण आदेश तथा अन्य आदेश भी पारित कर सकता है।
साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 
अधिवक्ता संजीव तिवारी संपर्क

1 comment:
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  1. यदि संरक्षण अधिकारी की रिपोर्ट न हो तो क्या घरेलू हिंसा का केस निरस्त होगा?

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महत्वपूर्ण सूचना- इस ब्लॉग में उपलब्ध जिला न्यायालयों के न्याय निर्णय https://services.ecourts.gov.in से ली गई है। पीडीएफ रूप में उपलब्ध निर्णयों को रूपांतरित कर टेक्स्ट डेटा बनाने में पूरी सावधानी बरती गई है, फिर भी ब्लॉग मॉडरेटर पाठकों से यह अनुरोध करता है कि इस ब्लॉग में प्रकाशित न्याय निर्णयों की मूल प्रति को ही संदर्भ के रूप में स्वीकार करें। यहां उपलब्ध समस्त सामग्री बहुजन हिताय के उद्देश्य से ज्ञान के प्रसार हेतु प्रकाशित किया गया है जिसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है।
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