Tuesday, 25 October 2016

मानसिक अयोग्यता से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकार

 

मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति से आशय है, वह व्यक्ति जिसे मानसिक रूप से अस्वस्थता के कारण चिकित्सा की आवश्यकता है।
  • जहां किसी अवयस्क के अभिभावक की इच्छा है कि उस मानसिक अस्वस्थ अवयस्क को मनोचिकित्सालय में चिकित्सा हेतु भर्ती करवाया जाए वहां वह प्रभारी स्वास्थ्य अधिकारी से इस आशय का निवेदन कर सकता है।
  • प्रत्येक पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी उसके थाने की सीमाओं में स्वछंद विवरण करते हुए मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति को अपने संरक्षण में ले सकता है तथा दो घंटे के अंदर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
  • जहां किसी कार्यवाही में मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति पर्याप्त साधनों के अभाव में वकील नियुक्त नहीं कर सकता, वहां मजिस्ट्रेट, वकील उपलब्ध कराएगा, जिसका व्यय राज्य वहन करेगा।
  • जहां किसी प्राधिकारी के आदेशानुसार मनोचिकित्सालय में निरूद्ध मानसिक अस्वस्थ्य व्यक्ति उन्मुक्त किया जाता है, वहां प्रभारी स्वास्थ्य अधिकारी यथाशीघ्र उसकी मानसिक व शारीरिक अवस्था की रिपोर्ट संबंधित प्राधिकारी को देगा।
  • जो कोई व्यक्ति विधि के प्रावधानों से अन्यथा किसी मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति को निरूद्ध रखता है, वह दो वर्ष तक के कारावास या एक हजार रूपये तक के अर्थदंड से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
  • जहां कोई मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति अपनी देखभाल करने में असमर्थ है, वहां कलेक्टर किसी योग्य व्यक्ति को अभिभावक नियुक्त कर सकेगा।
  • मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति को पेंशन, ग्रेच्युटी व अन्य भत्ते सरकार द्वारा दिए जाएंगे।
  • किसी भी मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति के साथ क्रूरता या तिरस्कारपूर्ण व्यवहार नहीं किया जाएगा।


मानसिक रोगी (चित्त-विकृत व्यक्ति) के संबंध में विधि में प्रावधान विकृत-चित्त मानव के संबंध में उनके संरक्षण, अधिकार एवं उपयोग एवं उपचार हेतु विधि में प्रावधान किया गया है, जो निम्नानुसार है:-
  • विकृत-चित्त क्या कहता है, क्या करता है, इसका उसे ज्ञान नहीं होता है। अतः वह यह नहीं जानता कि किया जाने वाला कार्य दोषपूर्ण है या विधि के प्रतिकूल है। अतः ऐसे कृत्य जो विकृत-चित्त अव्यवस्था में उसके द्वारा किए जाते हैं, उन्हें धारा 84 भा.दं.वि. के तहत अपवाद मानकर कोई अपराध नहीं होना कहा गया है।
  • धारा 375 भा.दं.वि. में विकृत-चित्त अवस्था के कारण किसी स्त्री की सहमति को सहमति न मानकर उसे स्त्री के साथ किए गए बलात्संग को धारा 376 भा.दं.वि. के तहत दंडनीय बनाया गया है। विधि की यह मंशा है कि ऐसी विकृत महिला उस कार्य की प्रकृति और परिणामों को समझने में असमर्थ है, जिसकी वह सहमति दे रही है। अतः अतः ऐसे विकृत चित्त स्त्री के संरक्षण हेतु उक्त प्रावधान बनाए गए हैं।
  • जो व्यक्ति विकृत-चित्त है और उसके विरूद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच की जा रही है तो विकृत चित्तता के कारण वह अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ होने के कारण धारा 328 दंप्र.सं. के तहत ऐसे व्यक्ति के चित्त-विकृत की जांच के लिए प्रावधान किए गए हैं, जिसमें उस व्यक्ति की जिले के सिविल सर्जन द्वारा अन्य चिकित्सक अधिकारी द्वारा जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करें, परीक्षा की जावेगी। तत्पश्चात् इस संबंध में उस चिकित्सा अधिकारी का साक्ष्य के रूप में परीक्षण किया जावेगा एवं मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति की चित्त-विकृति के
  • संबंध में निष्कर्ष लिखकर जांच कार्यवाही को रोकेगा।
  • धारा 329 दं.प्र.सं. में चित्त विकृत व्यक्ति के विचारण में मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय द्वारा चित्त-विकृत के तथ्य के संबंध में जांच किए जाने के एवं चित्त विकृत पाए जाने वाले पर कार्यवाही को रोके जाने का प्रावधान दिया गया है। धारा 330 दं.प्र.सं. में ऐसे चित्त-विकृत को अन्वेषण और विचारण के लंबित रहने तक समुचित देखरेख में छोड़े जाने का प्रावधान है। ऐसा चित्त-विकृत व्यक्ति के स्वस्थ हो जाने पर पुनः जांच या विचारण किये जाने का प्रावधान धारा 331 से 33 दं.प्र.सं. में दिए गए हैं। धारा 334 दं.प्र.संमें चित्त-विकृत के आधार पर दोषमुक्ति के प्रावधान है। इस तरह दं.प्र.सं. का अध्याय 25 विकृत-चित्त आरोपियों के संबंध में दिया गया है।
  • भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 12 में संविदा करने हेतु स्वस्थ चित्त व्यक्ति को सक्षम होना माना गया है। अतः स्वस्थ चित्त नहीं है, वह संविदा करने में सक्षम नहीं है। ऐसा व्यक्ति जो स्वस्थ चित्त नहीं है, यदि किसी समय वह स्वस्थ चित्त हो जाता है, तो वह संविदा कर सकता है और स्वस्थ चित्त व्यक्ति किसी समय स्वस्थ चित्त नहीं रहता है, तब संविदा नहीं कर सकता है।
  • व्य.प्र.सं. में आदेश 32 नियम 01 से 14 के प्रावधान विकृत चित्त व्यक्तियों पर भी लागू होते हैं और विकृत चित्त व्यक्ति की जांच करने के संबंध में भी बताया गया है। विकृत चित्त व्यक्ति सोचने और समझने योग्य नहीं रहता है। अतः उसके विरूद्ध या उसके द्वारा कोई वाद उक्त कारणों से नहीं चल सकता है। इसी कारण आदेश 32 व्य.प्र.सं0 में ऐसे विकृत चित्त जबकि वह वादी है तो उसकी ओर से वाद मित्र द्वारा दावा लाने और जबकि विकृत चित्त व्यक्ति प्रतिवादी है तो उसकी प्रतिरक्षा हेतु वादार्थ संरक्षक की नियुक्ति किए जाने के प्रावधान दिए गए हैं। अतः विकृत चित्तता के कारण ऐसे व्यक्ति का अहित न हो, इसलिए विधि में उसे उपरोक्तानुसार संरक्षण दिया गया है।

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