Saturday, 7 December 2019

आनंद मठ मंदिर समिति कौही एवं अन्‍य विरूद्ध ढालेन्द्र राम गजेन्द्र एवं अन्‍य


न्यायालयः-नवम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दुर्ग , जिला-दुर्ग  (छ.ग.)
(पीठासीन अधिकारीः-कु. स्मिता रत्नावत)
व्यवहार वाद क्रमांकः-69ए/2016
संस्थित दिनाँकः-21.06.2016
1. आनंद मठ मंदिर समिति, कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
द्वाराः-उपाध्यक्ष-
कौशल तिवारी पिता स्व. श्री पुरेन्द्र नाथ तिवारी,
उम्र-लगभग 55 वर्ष, निवासीः-ग्राम-कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
2. राजेश उर्फ हुलेश्वर प्रसाद तिवारी
पिता स्व. श्री अशोक तिवारी, उम्र लगभग 50 वर्ष
3. केदार प्रसाद तिवारी पिता स्व. श्री चुरामन प्रसाद तिवारी,
उम्र-लगभग 66 वर्ष
(मृत/विलोपित आदेश पत्रिका दिनाँकितः-27.01.2017)
4. शिव कुमार पाण्डेय पिता स्व. श्री प्रहलाद पाण्डेय,
उम्र-लगभग 50 वर्ष
5. मन्नूलाल टिकरिहा पिता स्व. श्री डोमार सिंह टिकरिहा,
उम्र-लगभग 52 वर्ष,
निवासी उपरोक्त सभीः-ग्राम-कौही,
तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.)                                                                        वादीगण
-:विरूद्धः-
1. ढालेन्द्र राम गजेन्द्र पिता स्व. श्री भुवन लाल गजेन्द्र,
उम्र-लगभग 50 वर्ष, निवासीः-क्वार्टर नम्‍बरर-13,
गुरूकृपा सदन, पाईप फैक्ट्री रोड, न्यू शांति नगर,
रायपुर, तहसील एवं जिला-रायपुर (छ.ग.)
2. रमेश मोदी पिता स्व. श्री छगन लाल मोदी,
प्रांताध्यक्ष, छत्तीसगढ़ विश्व हिन्दू परिषद,
कार्यालय पताः-सत्य नारायण भवन, काली नगर,
रायपुर, तहसील एवं जिला-रायपुर (छ.ग.)
3. छत्तीसगढ़ शासन,
द्वाराः-जिला मजिस्ट्रेट दुर्ग,
जिला-दुर्ग (छ.ग.)
4. आम जनता                                                                                                 प्रतिवादीगण

वादीगण द्वारा श्री हरेकृष्ण तिवारी अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा श्री राज कुमार रस्तोगी अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 3 द्वारा श्री विजय कसार अतिरिक्त शासकीय अभिभाषक।
प्रतिवादी क्रमांक 4 एकपक्षीय (दिनाँकः-05.12.2017)।
-ःनिर्णयः-
(आज दिनाँक 15 नवम्बर 2019 का घोषित)

1- वादीगण द्वारा यह वाद प्रतिवादीगण के विरूद्ध वादग्रस्त भूमि-

ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग के संबंध में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 को शून्य घोषित कर, वादग्रस्त संपत्ति में प्रतिवादीगण को हस्तक्षेप किये जाने से निषेधित करने हेतु स्थायी निषेधाज्ञा बाबत् संस्थित किया गया है।

वाद में उभयपक्ष के मध्य स्वीकृत तथ्य निम्नवत है- 
2- वर्ष 2013 में ग्राम कौही स्थित वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में वादी क्रमांक 1 समिति एवं ग्रामवासियों द्वारा दिनाँक 29.01.2013 को वादग्रस्त संपत्ति को ट्रस्ट समिति घोषित किये जाने हेतु आवेदन पत्र मुख्यम ंत्री, छत्तीसगढ़ राज्य, रायपुर को दिया गया था। आवेदन के परिप्रेक्ष्य में वादग्रस्त संपत्ति को ट्रस्ट बनाये जाने की कार्यवाही प्रारंभ कर, राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014-15 पंजीबद्ध कर, प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा आपत्ति दिनाँक 03.08.2015 प्रस्तुत किये जाने पर अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग द्वारा दिनाँक 17.08.2015 को आदेश पारित कर, ट्रस्ट बनाये जाने बाबत् प्रस्तुत आवेदन निरस्त कर दिया गया।

वादीगण का वाद संक्षेप में इस प्रकार है किः-
3- वादग्रस्त संपत्ति कृषि भूमि होने से, प्रतिवादी क्रमांक 3 के रूप में छत्तीसगढ़ शासन को पक्षकार बनाया गया है। वादीगण को प्रतिवादी क्रमांक 3 से कोई अनुतोष प्राप्त नहीं किया जाना है। वादग्रस्त संपत्ति कृषि सिलिंग सीमा अधिनियम से प्रभावित नहीं होती है। कौशल प्रसाद तिवादी एवं वादी क्रमांक 2 राजेश उर्फ कुलेश्वर प्रसाद तिवारी के पूर्वज ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला- दुर्ग के मालगुजार थे।

-:ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) स्थित वादग्रस्त संपत्ति का विस्तृत विवरणः-
-:तालिका-1:-

क्रमांक वादग्रस्त भूमि खसरा नम्‍बर रकबा कुल रकबा
1 श्री हनुमान सीर भूमि 50 1.10 एकड़ 6.37 एकड़ 425 2.80 एकड़ 429 2.47 एकड़
2 श्री महाकाली देवी सीर भूमि 430 0.83 एकड़ 1.59 एकड़ 445 0.76 एकड़
3 श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर 344 1.95 एकड़ 18.40 एकड़ 426 11.46 एकड़ 431 3.94 एकड़ 457 1.05 एकड़
कुल भूमि 26.327 26.327

उक्तानुसार तालिका-1 में उल्लेखित वादग्रस्त संपत्ति रामप्रसाद एवं उनके पूर्वजों द्वारा उक्त तालिका में उल्लेखित मंदिर को दी गई। वादग्रस्त संपत्ति की आय से, मंदिर को प्रदत्त किये जाने की दिनाँक से, मंदिर की देखरेख भोगराग आदि की व्यवस्था होते चली आ रही है। भक्तगण भगवान हनुमान जी, महाकाली जी पर श्रद्धा एवं आस्था रखने के कारण दर्शन हेतु आते हैं एवं अपनी इच्छानुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं। मालगुजारी के समय से ही वादग्रस्त संपत्ति सार्वजनिक मंदिर रहे हैं एवं तालिका 1 में उल्लेखित मंदिरों के सर्वराकार बिहारीलाल पिता श्री भगवान तिवारी ब्राम्हण थे। वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख हेतु ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग एवं आसपास के ग्राम के व्यक्तियों ने मिलकर, एक अपंजीकृत संस्था आनंद मठ मंदिर समिति, कौही का गठन किया। आनंद मठ मंदिर समिति विगत् 30 से 35 वर्षों से कार्य करते हुये, मंदिर एवं उसकी कृषि संपत्ति की देखरेख करते आ रही है। तालिका 1 में उल्लेखित संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज करवा लिया गया। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा बतौर सर्वराकार कभी भी वादग्रस्त संपत्ति पर आधिपत्य नहीं रखा गया, न ही वादी क्रमांक 1 समिति के देखरेख एवं व्यवस्था में किसी भी प्रकार से कोई हस्तक्षेप किया। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता सर्वराकार स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र की मृत्यु के उपरांत प्रतिवादी क्रमांक 1 ने वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में बिना किसी हक व अधिकार के बतौर सर्वराकार अपना नाम, अपने पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र के स्थान पर दर्ज करवा लिया।
इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 का वादग्रस्त संपत्ति पर किसी भी प्रकार का कोई हक, अधिकार एवं हस्तक्षेप नहीं था। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा ही वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था की जा रही थी एवं वर्तमान में भी निर्विध्न रूप से की जा रही है। ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग में स्थित हनुमान मंदिर, महाकाली मंदिर, जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा मंदिर, शिव मंदिर, विष्णु मंदिर, गायत्री मंदिर, कर्मा माता मंदिर, बूढ़ादेव मंदिर, संतोषी माता मंदिर, राम मंदिर, परमेश्वरी मंदिर, राधाकिशन मंदिर, शनि मंदिर, चंडी मंदिर, भैरोबाबा मंदिर, राजीव लोचन मंदिर, एकादशी मंदिर, नारायण देव मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, रामदरबार मंदिर आदि, बावड़ी सामुदायिक भवन, कला मंच, समरसता भवन, शासकीय भूमि खसरा नम्‍बरर 1147, 1148, 1149, 1150 रकबा क्रमशः 2.97, 0.18, 0. 17, 0.18 हेक्टेयर पर स्थित है। वादग्रस्त संपत्ति छ.ग. पर्यटन विभाग से संबंधित है। सभी मंदिर सार्वजनिक मंदिर होने से, आम जन से दर्शन एवं चढ़ावे में किसी भी प्रकार की रोकटोक नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति पर वर्ष में 2 बार अर्थात् नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि में धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। दोनों नवरात्रि में आम जन के आर्थिक सहयोग से 350 से 400 जोत प्रज्जवलित की जाती है। मंदिर के चढ़ावे, जोत की सहयोग राशि, आर्थिक जन सहयोग एवं शासकीय सहयोग से मंदिरों का विकास एवं मेले का आयोजन किया जाता है। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा विगत् 2 वर्ष पूर्व तक तथाकथित सर्वराकार रहते हुये, कृषि की आमदनी का उपयोग किया जाता था। प्रतिवादी क्रमांक 1 आमदनी का कोई हिसाब नहीं देते एवं न ही मंदिर की देखरेख एवं व्यवस्था में कोई सहयोग करते थे। आनंद मठ समिति वादी क्रमांक 1 की दिनाँक 17.01.2016 को आयोजित बैठक में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 की उपस्थिति में वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में पब्लिक ट्रस्ट बनाने पर चर्चा के दौरान प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा सहमति दी गई। वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेख में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम बतौर सर्वराकार दर्ज था। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की किसी भी प्रकार की कोई देखरेख एवं व्यवस्था नहीं की जाती थी। वादी क्रमांक 1 समिति ही वादग्रस्त संपत्ति की समस्त देखरेख एवं व्यवस्था करती थी। वर्तमान में वादी क्रमांक 1 समिति ही वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था कर रही है। अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग के न्यायालय में दर्ज राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113 वर्ष 2014-15 की आदेश पत्रिका दिनाँकित 17.11.2014 से 23.02.2015 तक में पक्षकारों को आहूत किये जाने हेतु आदेशित किये जाने के पश्चात् प्रकरण में दिनाँक 25.02.2015 की कार्यवाही के पश्चात् 17. 08.2015 को प्रकरण सुनवाई में लेकर, प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन कर, राजस्व प्रकरण अपास्त कर दिया गया है।
ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से वैधानिक आवश्यकता के बिना व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08. 02.2016 निष्पादित कर, वादग्रस्त संपत्ति की कीमत रू0 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) आंकलित कर, विश्व हिन्दू परिषद संस्था के छत्तीसगढ़ राज्य के प्रांत अध्यक्ष/प्रदेश अध्यक्ष रमेश मोदी प्रतिवादी क्रमांक 2 को पदेन अध्यक्षता में वादग्रस्त संपत्ति हस्तांतरित कर दी गई। प्रतिवादी क्रमांक 1 को पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 की आड  में वादग्रस्त संपत्ति को हस्तांतरित करने का कोई अधिकार नहीं था। वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति नहीं थी, न ही वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 के पूर्वजों द्वारा मंदिरों को दान में दी गई। वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन मालगुजार की भूमि होने से, तात्कालिन मालगुजार द्वारा मंदिर को दान में दी गई थी। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग को दिनाँक 03.08.2015 को राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113 वर्ष 2014-15 में वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी मंदिर एवं निजी न्यास की संपत्ति होने की मिथ्या सूचना दी गई। वादी क्रमांक 1 समिति की गठन के दिनाँक से वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था विगत् 40 वर्षों से वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा की जा रही है। प्रतिवादी क्रमांक 2 द्वारा पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 की आड़ में वादी क्रमांक 1 समिति के वादग्रस्त संपत्ति के कार्या ें एवं व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अवैध प्रयास किया जा रहा है। प्रतिवादी क्रमांक 2 द्वारा पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के आधार पर वादग्रस्त संपत्ति पर बतौर सर्वराकार स्वयं का नाम नामांतरित किये जाने हेतु आवेदन पत्र तहसीलदार पाटन, जिला-दुर्ग के न्यायालय में दिये जाने पर, नायब तहसीलदार दुर्ग द्वारा प्रस्तुत आवेदन की सुनवाई कर, दिनाँक 12.04.2016 को आगामी सुनवाई दिनाँक 29.04.2016 के लिये ईश्तहार प्रकाशन एवं मुनादी करवाये जाने पर, वादी क्रमांक 1 समिति के सदस्यों को व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के निष्पादन की जानकारी होने से, यह वाद संस्थित किये जाने का वाद कारण प्राप्त हुआ। वादीगण द्वारा संस्थित वाद पंजीकृत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 को शून्य घोषित किये जाने हेतु व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 के मूल्य रू. 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) एवं वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से प्रतिवादी क्रमांक 2 को स्थायी रूप से निषेधित किये जाने हेतु रू0 5,000/- (पाँच हजार रूपये) का मूल्य प्राक्कलित कर, क्रमशः रू. 500/-, रू0 500/- कुल रू0 1,000/- का न्याय शुल्क चस्पा किया गया है।

4- प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा जवाबदावा प्रस्तुत कर, वादीगण के अभिवचनों को अस्वीकार कर, अभिकथन किया गया है कि प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था सर्वराकार की हैसियत से स्वयं की जाती है। प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में बतौर सर्वराकार दर्ज है। प्रतिवादी क्रमांक 1 का वादग्रस्त संपत्ति पर अनन्य आधिपत्य है। पूर्व में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता द्वारा एक मंदिर समिति का अस्थायी गठन किया गया था। समिति के अस्थायी गठन का उद्देश्य समय-समय पर ग्राम कौही में लगने वाले मेले एवं मंदिर में प्रसाद का सुचारू वितरण करना था। मंदिर समिति का कभी वादग्रस्त संपत्ति पर किसी भी प्रकार का हक, अधिकार व हस्तक्षेप नहीं रहा है। वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता, तत्पश्चात् स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 का हक एवं कब्जा वर्ष 1957 से चला आ रहा है। मंदिर समिति का कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं है। आनंद मठ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष की हैसियत से श्री कौशल तिवारी वादग्रस्त संपत्ति में कोई वैधानिक हक नहीं रखने के कारण वाद संस्थित करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित होने वाले पूजा कार्यक्रम एवं मेला एवं उत्सव के प्रबंधन के लिये सर्वराकार द्वारा समय-समय पर अस्थायी समिति का गठन किया जाता रहा है। ऐसी ही एक समिति का गठन दिनाँक 01.06.2016 को प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 द्वारा किया गया था, जिसमें वादीगण को शामिल नहीं किया गया था। वादीगण द्वारा दुर्भावनापूर्वक प्रतिवादीगण को परशान करने की गरज से मिथ्या वाद संस्थित किया गया है, जो खारिज किये जाने योग्य है। वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख पूर्व सर्वराकार बिहारीलाल ब्राम्हण द्वारा की जाती थी। तत्पश्चात् प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता का नाम वर्ष 1957 में वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा सर्वराकार के रूप में वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर में स्थापित देवी-देवता की पूजा, भोग आदि का प्रबंधन किया जाने लगा। स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र की मृत्यु उपरांत प्रतिवादी क्रमांक 1 का नाम विरासतन हक में दिनाँक 27.01.2012 को राजस्व अभिलेखों में नामांतरित किया गया। सर्वराकार द्वारा वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि की देखरेख एवं व्यवस्था की जाती थी। दिनाँक 27.09.2012 के पश्चात् से प्रतिवादी क्रमांक 1 वादग्रस्त संपत्ति के आधिपत्य में होकर, वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं प्रबंधन का निर्विध्न रूप से बतौर सर्वराकार कार्य कर रहे हैं।

वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज को विक्रय कर, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित रानीतराई, जिला-दुर्ग के बचत खाता क्रमांक 61034000691 में वर्ष 2013 तक गलत ढंग से राशि जमा होते आ रही थी। कृषि आय को वादियों द्वारा आहरण कर अनुचित उपयोग कर लिया जाता था। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा राजस्व अभिलेखों में स्वयं के नाम से भूमि दर्ज नहीं होने के बावजूद अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके वर्ष 2013 तक मंदिर के कृषि भूमि की उपज की राशि खाते में जमा करा ली जाती थी। गलत प्रक्रिया को सुधारते हुये, सहकारी समिति द्वारा आदेशित करने पर वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिल ेखों में दर्ज सर्वराकार के नाम पर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रानीतराई, जिला-दुर्ग में दिनाँक 13.10.2014 को बैंक खाता 101001566252 खोला गया, जिसमें दिनाँक 30.12.2014 से 30.01.2017 तक वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि के उपज की राशि जमा हुई। वादीगण द्वारा वर्ष 1983 से 2013 तक वादग्रस्त संपत्ति में समाहित कृषि भूमि की उपज की आय को स्वयं प्राप्त कर, हिसाब किताब बार-बार मांगे जाने पर भी नहीं दिया जाता था। वादीगण का उक्त आय का व्यक्तिगत् उपयोग किये जाने के कारण खाते में मात्र 12,363/- रूपये शेष है। वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज की आय एवं चढ़ावे का इस कदर दुरूपयोग किया जा रहा था कि दिनाँक 01.06.2016 को प्रस्ताव पारित कर, वादीगण को मंदिर का पैसा वापस किये जाने हेतु कहा गया है। अस्थायी समिति द्वारा दिनाँक 27.07.2016 को अनुविभागीय अधिकारी एवं दिनाँक 15.06. 2017 को तहसीलदार को पत्र लिखकर, वादीगण से मंदिर मद की शेष राशि जमा करवाये जाने हेतु कहा गया था। वादीगण द्वारा मंदिर के धन का दुरूपयोग किया जाता था। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं प्रबंधन बतौर सर्वराकार आज भी किया जा रहा है। प्रतिवादी क्रमांक 1 वैधानिक प्रक्रिया के तहत् वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था कर रहे हैं। व्यवस्था पत्र के निष्पादन के लिये भारतीय मुद्रांक शुल्क एवं पंजीकरण अधिनियम के तहत् उक्त मुद्रांकन शुल्क अदा करने के उद्देश्य से वादग्रस्त संपत्ति का मूल्यांकन रू0 1,25,51,280/- बाजार मूल्य कर, मुद्रांक एवं पंजीकरण शुल्क भुगतान किया गया है। व्यवस्था पत्र के निष्पादन में किसी भी प्रकार का मौद्रिक लेनदेन नहीं हुआ है। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की उचित देखभाल के उद्देश्य से व्यवस्था पत्र का निष्पादन छग. विश्व हिन्दू परिषद/प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित किया गया है। प्रतिवादी क्रमांक 1 वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार होने के नाते वैधानिक रूप से अंतरण कर सकता है। व्यवस्था पत्र के निष्पादन से वादग्रस्त संपत्ति के स्वरूप एवं प्रकृति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं हो रहा है। व्यवस्था पत्र से वादग्रस्त संपत्ति को विक्रय या अंतरित करने का प्रयास नहीं किया गया है। प्रतिवादीगण के विरूद्ध किसी भी प्रकार की निषेधाज्ञा या आज्ञप्ति पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर 1957 में नामांतरित हुआ। ऐसी स्थिति में वाद समय सीमा बाधित है। वादीगण द्वारा अपने वाद का उचित मूल्यांकन न कर, पर्याप्त न्याय शुल्क अदा नहीं किया गया है। वादीगण द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति में वाद प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है।

5- प्रतिवादी क्रमांक 3 द्वारा जवाबदावा प्रस्तुत कर, वादीगण के अभिवचनों को अस्वीकार कर, अभिकथन किया गया है कि आनंद मठ नाम की कोई पंजीकृत संस्था नहीं है। वादग्रस्त संपत्ति का संचालन ग्राम कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग के आसपास की गाँवों द्वारा किया जाता रहा है। वादग्रस्त संपत्ति सर्वप्रथम बिहारीलाल ब्राम्हण के नाम पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी। उपरोक्त भूमि को मोहनानंद द्वारा मंदिरों को दान किया गया था। प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री सतनाथ का नाम अधिकार अभिलेख पंजी में वर्ष 1954-55 के अनुसार दर्ज है। स्व. श्री भुवनलाल की मृत्यु के उपरांत वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार के रूप में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम दर्ज हुआ। प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 निष्पादित किया गया है। सर्वराकार के नामांतरण हेतु नायब तहसीलदार पाटन के न्यायालय में दिया गया आवेदन राजस्व प्रकरण क्रमांक 33अ/2006, वर्ष 2015-16 दिनाँकित 24.05.2016 के अनुसार नामांतरण आवेदन निरस्त कर दिया गया है।

6- उभयपक्ष के अभिवचनों के आधार पर, पूर्व पीठासीन अधिकारी द्वारा निम्नलिखित वाद-प्रश्न दिनाँकः-21.04.2017 को विरचित किये गये। समक्ष निष्कर्ष लेखबद्ध किये गयेः- 

(क्रमांक/वाद-प्रश्न/निष्कर्ष
01. क्या वादी समिति द्वारा विगत् 30-35 वर्षों से श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) की संपत्तियों का देखरेख व व्यवस्था किया जाता रहा है? ‘हाँ‘
02. क्या आनंद मठ मंदिर समिति का वैधानिक अस्तित्व नहीं होने से, उसे वाद प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है? ‘हितबद्ध व्यक्ति की हैसियत से वाद संस्थित का अधिकार‘
03. क्या श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) एवं उनकी संपत्तियाँ प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति है? ‘प्रमाणित नहीं‘।
04. क्या प्रतिवादी क्रमांक 1 को श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर के सर्वराकार की हैसियत से उक्त मंदिरों के देखरेख व व्यवस्था के संबंध में प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र निष्पादित करने का अधिकार है? ‘हाँ‘।
05. क्या वादीगण प्रतिवादी क्रमांक 1 द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँक 08.02.2016 को अवैध व शून्य घोषित करने के अनुतोष प्राप्त करने के अधिकारी हैं? ‘नहीं‘
06. क्या वादीगण प्रतिवादी क्रमांक 1 और 2 के विरूद्ध उसके द्वारा श्री हनुमान मंदिर, श्री हनुमान मंदिर-श्री महाकाली मंदिर, श्री महाकाली मंदिर ग्राम-कौही, तहसील-पाटन, जिला-दुर्ग (छ.ग.) की संपत्तियों का देखरेख व व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से, स्थायी रूप से निषेधित करने के अनुतोष प्राप्त करने के अधिकारी हैं? ‘नहीं‘
07. सहायता एवं व्यय? ‘निर्णय कंडिका-21 अनुसार‘। )

-ःनिष्कर्ष के आधारः- 
-ःवाद प्रश्न क्रमांक 1 एवं 2ः-
7- कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने न्यायालयीन मुख्य परीक्षण में अभिसाक्ष्य दिया है कि वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा की जाती है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वर्ष 1982 में स्वयं की उम्र 16 वर्ष होने के समय, वादग्रस्त संपत्ति के तात्कालिन सर्वराकार/प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता श्री भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित मेले के समय बनाई गई अस्थायी आनंद मठ समिति के सदस्‍यों द्वारा मौके का फायदा उठाकर, वादग्रस्त संपत्ति के संचालन का प्रभार स्वयं प्राप्त कर, वादग्रस्त संपत्ति से संबंधित समस्त भूमि की देखरेख का प्रभार अपने पास रख, अराजकता फैलाना प्रार ंभ कर दिये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण में, वादी क्रमांक 1 समिति के नाम पर सरकारी बैंक अधिकारियो ं से साठगांठ कर, बैंक में खाता खोलकर, वादग्रस्त संपत्ति में संलग्न भूमि से होने वाली आय से कुछ अंश को बैंक में जमा करवाये जाने का तथ्य प्रकट कर, अधिकांश पैसों को हड़पने वालों में, कौशल तिवारी वासा-3, राजेश उर्फ हुलेश्वर प्रसाद वासा-1, केदार प्रसाद तिवारी (मृत वादी क्रमांक 3), शिव कुमार पाण्डे वादी क्रमांक 4 एवं मन्नूलाल टिकरिया वादी क्रमांक 5 के शामिल होने की साक्ष्य प्रकट की है। इसके विपरीत यदि प्रतिवादी क्रमांक 1 के अभिवचनों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जावे, तो ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में प्रकट उक्त साक्ष्य संबंधी अभिवचन, संपूर्ण जवाबदावे में शब्दशः आशय के समाहित होना दर्शित नहीं है। इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने प्रस्तुत अभिवचनों की कंडिका 1 में स्वीकार किया है कि स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता तात्कालिन सर्वराकार भुवनलाल गजेन्द्र द्वारा एक मंदिर समिति का अस्थायी गठन समय-समय पर ग्राम कौही में भरने वाले मेलों एवं प्रसाद आदि के वितरण को सुचारू रूप से संचालित करने के आशय से किया गया था। यद्यपि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के अभिवचनों में वर्ष 1982 से वादी क्रमांक 1 समिति का कथित अस्थायी गठन का तथ्य उल्लेखित नहीं है। इसके विपरीत ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य के प्रतिपरीक्षण का अवसर पर्याप्त रूप से वादीगण को प्राप्त होना अभिलेख से स्पष्टतः दर्शित है। फलतः ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य से पूर्व के अभिवचनों की तुलना की जावे, तो यह प्रकट होता है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 वर्ष 1982 से वादी क्रमांक 1 समिति के वादग्रस्त संपत्ति पर समय-समय पर मेला आयोजन के समय अस्थायी गठन के तथ्य को स्वीकार करते हैं। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में, वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख, व्यवस्था हेतु गठित वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वाद संस्थित दिनाँक से विगत् 40 वर्षों से वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख, व्यवस्था किये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में उक्त साक्ष्य का समर्थन किया है।

8- बेनीप्रसाद तिवारी वासा-2 ने अपने मुख्य परीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर वर्ष में दो बार अर्थात् नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि में धार्मिक मेला आयोजित होने, वर्ष की दोनों नवरात्रि में 300 से 400 जोत प्रज्जवलित होने एवं मंदिर में आये चढ़ावे, जोत की सहयोग राशि, जन सहयोग तथा शासकीय सहयोग से वादग्रस्त संपत्ति के समस्त मंदिरों का विकास एवं मेले का आयोजन वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा किये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। जेठूराम वासा-4 ने बेनीप्रसाद तिवारी वासा-2 की अपने मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य का समर्थन किया है। जेठूराम वासा-4 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 5 में, स्वयं की साक्ष्य दिनाँक से 2 वर्ष पूर्व तक ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के सर्वराकार की हैसियत में लगभग 25 एकड़ जमीन होने का तथ्य स्वीकार कर, ऐसी भूमि से उत्पन्न समस्त उत्पाद को आनंद मठ मंदिर समिति के संचालक को प्राप्त होने का तथ्य स्वीकार किया है। जेठूराम वासा-4 की उक्त साक्ष्य से यह दर्शित है कि वर्ष 2016 के लगभग समय के पूर्व तक वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही का वादग्रस्त संपत्ति में कुछ तो योगदान रहा है।

9- योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में, वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आम जन द्वारा चढ़ाये गये चढ़ावे की देखरेख वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। यद्यपि योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आये चढ़ावे से मंदिर के विकास से इंकार कर, स्वतः कथन कर, मंदिर में आये चढ़ावे को वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा अपने फंड में रखकर, मंदिर में बिजली व्यवस्था, प्रसाद वितरण, पुजारी का खर्च, मंदिर के मोटर पंप के सुधार कार्य का खर्च, मंदिर की लिपाई-पुताई, मेले के खर्च आदि में ऐसे चढ़ावे के व्यय किये जाने का तथ्य प्रकट किया है। योगेश्वर साहू प्रसा-2 की उक्त स्वीकारोक्ति से स्पष्ट है कि मंदिर में आये चढ़ावे से मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य करवाया जाता था। योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने अग्र प्रतिपरीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर का विकास श्रद्धालुगण द्वारा करवाये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 63 व योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में, प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि एवं वर्ष की दोनों नवरात्रि में आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा मेले का आयोजन एवं जोत जलवाने का कार्यक्रम पूर्ण करवाये जाने के सुझाव से भी स्वीकारोक्ति प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 स्वयं द्वारा अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में, वादग्रस्त संपत्ति पर आयोजित मेले एवं जोत जलवाने के कार्यक्रम एवं हिसाब किताब आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा विगत् 50 वर्षों से किये जाने का तथ्य भी स्वीकार किया है। यद्यपि स्वतः कथन कर, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पदाधिकारी के हर 6 महीने में बदलने के स्पष्ट तथ्य का रहस्योद्याटन किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 66 में, वादग्रस्त संपत्ति की उपज के विक्रय प्रतिफल का चेक आनंद मठ मंदिर समिति के माध्यम से प्राप्त होने का स्वतः कथन किया है। यद्यपि उभयपक्ष द्वारा उक्ताशय का कोई भी उपज विक्रय से संबंधित प्रतिफल राशि का चेक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसके विपरीत वादीगण की ओ से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 को प्रतिपरीक्षण में वादग्रस्त संपत्ति पर उत्पादन के प्रतिफल स्वरूप प्रदत्त चेक, वादग्रस्त संपत्ति के मंदिर में स्थित भगवान के नाम से लेखकर, प्रदत्त किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। योगेश्वर साहू प्रसा-2 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 20 में, आनंद मठ मंदिर समिति द्वारा स्वयं साक्षी के जन्म के पूर्व से वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर की व्यवस्था वर्ष 1954 से किये जाने के सुझाव को स्वीकार किया है। रामसिंग साहू प्रसा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में, मंदिर में होने वाले आयोजनों के समय श्रद्धालुओं के निवास हेतु सामुदायिक भवन बनवाने एवं दर्शन व्यवस्था हेतु मंदिर में प्रवेश करने बाबत् पाईप लगवाने की व्यवस्था, समिति द्वारा किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। उभयपक्ष के साक्षियों द्वारा उपरोक्तानुसार स्वीकृत साक्ष्य से स्पष्ट है कि आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में होने वाले विभिन्न आयोजनों के साथ साथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य समय-समय पर किया जाता रहा है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा बैंक अधिकारियों से सांठगांठ कर, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के नाम पर बैंक में खाता खुलवाये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अभिवचनों की कंडिका 5-अ में, वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति की कृषि उपज के विक्रय से प्राप्त आय को जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित दुर्ग के खाता क्रमांक 61034000691 में वर्ष 2013 तक गलत ढंग से जमा किये जाने का अभिवचन किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 7 में, वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति से उद्भूत आय के कुछ अंश को बैंक मे जमा करवाने एवं अधिकांश पैसों को स्वयं हड़प लिये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 44 में, वादी क्रमांक 1 समिति के बैंक खाते में दिनाँक 01.04.2012 से 31.07.2017 तक जमा राशि के संबंध में खाता स्टेटमेंट की कम्प्यूटरीकृत प्रति (प्रदर्श डी-40) प्रस्तुत की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 40 में आनंद मठ मंदिर समिति की दिनाँक 01.06. 2016 को आयोजित बैठक का एक पंजी में 5 पृष्ठों में उल्लेखित ब्यौरा (प्रदर्श डी-36) प्रस्तुत किया है।
यदि आनंद मठ मंदिर समिति की दिनाँक 01.06.2016 को आयोजित बैठक की पंजी में 5 पृष्ठों में उल्लेखित ब्यौरा (प्रदर्श डी-36) की प्रथम पंक्ति का सूक्ष्मता से परीक्षण किया जावे, तो शीर्षक-‘‘आनंद मठ मंदिर समिति की बैठक‘‘ से स्पष्ट है कि कोई समिति अस्तित्वाधीन थी, जिसकी दिनाँक 01.06.2016 को पुनर्गठन एवं आय-व्यय की जानकारी संधारित करते हुये, ब्यौरे (प्रदर्श डी-36) के प्रथम पृष्ठ पर 12 व्यक्तियों के पास वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर का पैसा उपलब्ध होने से, अविलंब मंदिर के खाते में जमा करने हेतु कहा जा रहा था। स्वयं प्रतिवादीगण की ओर से प्रस्तुत उक्त बैठक के ब्यौरे (प्रदर्श डी-36) में उल्लेखित अंतर्वस्तु से आनंद मठ मंदिर समिति का अस्तित्व होना स्वमेव दर्शित है। कौशल तिवारी वासा-3 ने स्वयं को आनंद मठ मंदिर समिति का उपाध्यक्ष होकर, समिति द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर की देखरेख किये जाने का तथ्य अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में स्वीकार किया है। यद्यपि प्रतिवादीगण की ओर से कौशल तिवारी वासा-3 के प्रतिपरीक्षण में, स्वयं के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष होने की हैसियत से दस्तावेज की वांछा किये जाने पर, कोई दस्तावेज प्रस्तुत किये जाने से स्पष्टतः इंकार किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने अग्र प्रतिपरीक्षण में, आनंद मठ मंदिर समिति कौही के नाम से कोई समिति पंजीकृत नहीं होने के प्रतिवादीगण के सुझाव से, अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में सहमति व्यक्त की है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 14 में, स्वयं को ग्राम कौही के पुराने सदस्यों द्वारा, वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष घोषित किये जाने का तथ्य प्रकट कर, ऐसी घोषणा से संबंधित कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। यद्यपि वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व से संबंधित कोई दस्तावेज वादीगण की ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया है। वादी क्रमांक 1 समिति की विधि अनुसार पंजीयन के फलस्वरूप अस्तित्वाधीन होने के भी कोई प्रमाण प्राथमिक साक्ष्य से प्रमाणित किये जाने की चेष्टा नहीं की गई है। वादी क्रमांक 1 समिति के कथित उपाध्यक्ष कौशल तिवारी वासा-3 के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष होने के संबंध में कोई दस्तावेज अभिलेख में संलग्न नहीं है। इसके विपरीत उभयपक्षों की स्पष्ट दृढ साक्ष्य है कि-प्रत्येक वर्ष विभिन्न अवसरों पर वादग्रस्त संपत्ति पर मेले, जोत जलवाने के कार्यक्रम का संपूर्ण आयोजन एवं एसे आयोजन का हिसाब किताब वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा पिछले 30-35 वर्षों से किया जाना, अभिलेख पर उपलब्ध है।

10- प्रतिवादीगण की ओर से अभिवचनों एवं अंतिम तर्क स्तर पर यह विवाद्यक उठाया गया है कि वादी क्रमांक 1 समिति को स्वयं का वैधानिक अस्तित्व नहीं होने से, वाद संस्थित किये जाने का कोई अधिकार नहीं है। यद्यपि वादीगण की ओर से वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व से संबंधित आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पंजीयन का कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है, न ही कौशल तिवारी वासा-3 के वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष की प्रास्थिति रखने संबंधी कोई दस्तावेजी साक्ष्य अभिलेख पर है। इसके विपरीत स्वयं ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में, आनंद मठ मंदिर समिति कौही द्वारा विगत् 50 वर्षों से वादग्रस्त संपत्ति पर मेले एवं जोत कार्यक्रम आयोजित किये जाने का तथ्य स्वीकार कर, स्वतः कथन कर समिति के पदाधिकारी का हर 6 माह में बदलने का तथ्य प्रकट किया गया है। स्वयं प्रतिवादीगण की ओर से आनंद मठ मंदिर समिति कौही के बैठक संबंधी विवरण एवं जिला सहकारी केन्द्रीय मर्यादित बैंक में खाता संधारण संबंधी खाता स्टेटमेंट से आनंद मठ मंदिर समिति कौही के अस्तित्व के दृढ प्रमाण उपलब्ध है। प्रतिवादीगण द्वारा वादी क्रमांक 1 समिति के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न करते हुये, वाद लाने के अधिकार को चुनौती दी गई है। इसके विपरीत वादीगण की ओर से वादग्रस्त संपत्ति में हित रखने वाला हितबद्ध व्यक्ति वाद लाने का अधिकार रखता है, का तर्क प्रस्तुत करते हुये निम्नवत् न्याय दृष्टांत प्रस्तुत किया गया हैः-

श्री श्री गोपाल विरूद्ध बलदेव नारायण (1946)2 कोलकाता 447 
प्रतिपादित विधिः-यदि सर्वराकार वाद लाने के लिये अक्षम या अनिच्छुक है, तो भावी सर्वराकार, संस्थापक का विधिक प्रतिनिधी या कोई हितबद्ध व्यक्ति एवं भगवान की मूर्ति स्वयं वादमित्र के माध्यम से वाद संस्थित कर सकती है।

किशोर जौर विरूद्ध गुमान बिहारी जौर 
ए.आइ .आर. 1978, इलाहाबाद 1 
प्रतिपादित विधिः-धार्मिक बंदोबस्ती-भगवान द्वारा या की ओर से वाद अपवादित दशाओं को छोड़कर, सामान्यतः सर्वराकार द्वारा संस्थित किया जा सकता है। अपवादित परिस्थितियों में सर्वराकार से पृथक् व्यक्ति भी भगवान की ओर से वाद ला सकता है। जिलाधीश भी भगवान का व्यवस्थापक होने के नाते वाद ला सकते हैं। वाद पोषणीय माना गया। उक्त न्याय दृष्टांत र्में ए.आइ .आर. 1961 इलाहाबाद 73 पर विश्वास व्यक्त किया गया है।

मुखर्जी द्वारा लिखित ‘‘हिन्दू विधि‘‘ के पृष्ठ क्रमांक 265 पर भगवान को विधिक व्यक्ति मानकर सर्व राकार के माध्यम से वाद संस्थित किये जा सकने की विधि उल्लेखित है। यदि सर्वराकार उपेक्षित या विरूद्ध पक्षकार का है, तो एक पूजा करने वाले/पूजक व्यक्ति या धार्मिक बंदा ेबस्ती में हितबद्ध अन्य व्यक्ति, देवता के अधिकार के संरक्षण हेतु वाद संस्थित करने का हक रखता है।

परसराम दास जी विरूद्ध विजय नारायण 
एस.ए. नं.-3/1970, निर्णय दिः-31.12.1976
प्रतिपादित विधिः-सर्वराकार द्वारा किये गये प्रतिकूल कृत्य के कारण उद्भूत वादकारण हेतु एक पूजक द्वारा भी वाद संस्थित किया जा सकता है। उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि के आलोक में, इस वाद की परिस्थितियों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया जावे, तो यह स्पष्ट है कि वादी क्रमांक 1 समिति के पदाधिकारी एवं सदस्यगण वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर में आयोजित धार्मिक आयोजनों हेतु समिति का प्रत्येक सदस्य, वादग्रस्त मंदिर पर स्थित भगवान में श्रद्धा रखते हुये, पवित्र भावना के साथ धार्मिक आयोजन (जोत प्रज्जवलन एवं मेला आयोजन) में आस्था रखते हुये, आयोजन की संपूर्ण परंपराओं का निर्वहन करते हुये, संपादित करने के उद्देश्य के साथ भौतिक एवं मानसिक रूप से आवश्यक सहयोग कर, संपादित करते हुये, आ रहे होने की उभयपक्ष की दृढ विश्वसनीय साक्ष्य अभिलेख पर प्रकट हुई है। अतः यह स्पष्ट है कि वादी क्रमांक 1 समिति धार्मिक एवं मानसिक रूप से वादग्रस्त संपत्ति में हितबद्ध व्यक्ति की श्रेणी में आते थे। वादीगण की ओर से प्रस्तुत न्याय दृष्टांत के आलोक में भगवान से हितबद्ध व्यक्ति भी भगवान की संपत्ति की रक्षा हेतु वाद संस्थित कर सकते हैं। अतः वादी क्रमांक 1 समिति को यह वाद संस्थित किये जाने का अधिकार होना प्रमाणित पाया जाता है।

-ःवाद प्रश्न क्रमांक 3ः-
11- अब यह देखा जाना आवश्यक है कि वादग्रस्त संपत्ति का उद्भव कब व कैसे हुआ?
कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 में, स्वयं को वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्थापक समिति का उपाध्यक्ष होना व्यक्त करते हुये, वादग्रस्त संपत्ति की भूमि तात्कालिन मालगुजार रामप्रसाद एवं उनके पूर्वजों द्वारा श्री हनुमान मंदिर, महाकाली मंदिर, हनुमान मंदिर-महाकाली मंदिर के नाम से दी जाने की साक्ष्य प्रकट की है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, कौशल तिवारी वासा-3 के मुख्य परीक्षण में प्रकट साक्ष्य का समर्थन किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 17 में, वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन भगवान द्वारा सर्वराकार को दिये जाने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 में, स्वयं को वर्तमान में रायपुर में परिवार सहित निवास करना व्यक्त करते हुये, अपने स्वामित्व की भूमि को मंदिर में स्थित भगवान हेतु ग्राम कौही में छोड़कर रखे जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पिता द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र द्वारा, ग्राम कौही स्थित समस्त मंदिरों का वर्ष 1922 से 1923 तक निर्माण करवाये जाने की साक्ष्य प्रकट कर, उक्त तथ्य के प्रमाण स्वरूप अधिकांश मंदिरों की दीवार पर स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र का नाम खुदा हुआ होना प्रकट किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, कालांतर में कुछ मंदिरों में रिपेयरिंग के दौरान स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र का नाम मिट/हट जाने का तथ्य स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने अग्रमुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पूर्वज एवं परिवार के सभी सदस्यों द्वारा मंदिरों की देखरेख किये जाने की साक्ष्य प्रकट कर, मंदिर परिसर के विकास हेतु लगभग 25 से 26 एकड़ भूमि को मंदिर में स्थित भगवान हेतु सुरक्षित कर दिये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 भगवान हेतु 25-26 एकड़ भूमि को सुरक्षित रखे जाने का कारण भूमि को अधिया-रेघा या खुदकाश्त कर, अर्जित आय से मंदिर परिसर की देखरेख किया जाना प्रकट किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अग्र परीक्षण की कंडिका 2 में, स्वयं के पूर्वज स्व. श्री सतनाथ गजेन्द्र को समस्त मंदिर परिसर का सर्वराकार कहे जाने की साक्ष्य प्रकट की है।
इसके विपरीत यह उल्लेखनीय है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 एवं 2 में, प्रकट तथ्यों को प्रथम बार मुख्य परीक्षण में ही प्रकट किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 एवं 2 में, प्रकट उक्त तथ्यों को स्वयं के अभिवचन अर्थात् जवाबदावा में अभिवचनित नहीं किया है। अभिवचन के प्रमाणन हेतु दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य पेश किये जाने की विधि है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा अभिवचनों के अभाव में प्रकट मात्र मुख्य परीक्षण साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम के विधिक प्रावधानों के तहत् अग्राह्य है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति स्वयं के पूर्वज श्री सतनाथ गजेन्द्र द्वारा मंदिर को दिये जाने/सुरक्षित रखे जाने के संबंध में प्रकट साक्ष्य अभिवचनों के अभाव में विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती है। अनुविभागीय अधिकारी पाटन, जिला-दुर्ग द्वारा ग्राम कौही के सरपंच एवं ग्रामवासी द्वारा मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ राज्य के समक्ष प्रस्तुत आनंद मठ मंदिर समिति कौही को ट्रस्ट समिति घोषित किये जाने बाबत् आवेदन के परिप्रेक्ष्य में दर्ज राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014- 15 में, ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा दिनाँक 03.01. 2015 को आनंद मठ मंदिर समिति के नाम से ट्रस्ट बनाने हेतु पूर्व से प्रस्तुत आवेदन को निरस्त करने बाबत् आवेदन (प्रदर्श पी-18) में वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी एवं निजी न्यास की संपत्ति होना प्रकट कर, ग्राम पंचायत व ग्रामवासी कौही का ट्रस्ट बनाने हेतु दिया गया आवेदन दिनाँकित 09.01.2013 (प्रदर्श पी-14) को निरस्त किये जाने का निवेदन किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा आवेदन दिनाँकित 09.01.2013 (प्रदर्श पी-14) में उल्लेखित अंतर्वस्तु से स्पष्ट दर्शित है कि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं के निजी संपत्ति होने के संबंध में दावा कर रहे हैं।

12- प्रतिवादी क्रमांक 1 एवं 2 की ओर से कौशल तिवारी वासा-3 को प्रतिपरीक्षण की कंडिका 17 एवं 18 में यह सुझाव दिये जाने पर कि वादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति श्री हनुमान जी, श्री महाकाली देवी, श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी को प्रदत्त किये जाने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है, के तथ्य से सहमति व्यक्त की गई है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 28 में वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर में भगवान के नाम पर भूमि के स्वत्व के संबंध में दान पत्र, विक्रय पत्र, इकरारनामा, बंटवाराना से संबंधित कोई भी पंजीकृत दस्तावेज प्रकरण में प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है।
इस प्रक्रम पर माननीय न्यायालय द्वारा प्रतिपादित न्याय दृष्टांत उल्लेखनीय है-

2006(1) ए.एल.जे. 54 (58) 
प्रतिपादित विधि-भूमि का धार्मिक एवं पूर्त न्यास बंदोबस्त सृजित किये जाने हेतु पंजीकृत विलेख अनिवार्य नहीं है।
उक्त न्याय दृष्टांत के आलोक में, वादग्रस्त संपत्ति को मूल भूमिस्वामी द्वारा भूमि को भगवान के नाम पर प्रदत्त किये जाने हेतु किसी पंजीकृत दस्तावेज निष्पादित करने की विधिक अनिवार्यता नहीं होने से, वादीगण द्वारा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने से कोई प्रतिकूल प्रभाव किसी भी पक्ष पर नहीं पड़ता है।

 तालिका 2
 वादग्रस्त संपत्ति के प्रारंभ से वर्तमान तक का विस्तृत विवरण


 इसके विपरीत तालिका क्रमांक 2 में उल्लेखित विस्तृत विवरण से स्पष्ट है कि प्रारंभ में वादग्रस्त संपत्ति तात्कालिन लंबरदार व दीगर हिस्सेदारों के स्वामित्व की होकर, भगवान श्री हनुमान, श्री महाकाली देवी एवं श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी को प्रदत्त किये जाने पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुई।

तात्कालिन प्रवर्ति त विधि म.प्र. भू राजस्व संहिता की धारा 158(3) के अनुसार-प्रत्येक व्यक्ति-(एक) जो राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे म0प्र0 भू राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम 1992 के प्रारंभ पर या उसके पूर्व मंजूर किये गये किसी पट्टा के आधार पर भूमिस्वामी अधिकार में भूमि धारण किये हुये हैं, एसे प्रारंभ की तारीख से, और। 
(दो) जिसे राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे म0प्र0 भू राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम 1992 के पश्चात् किया गया है, एसे आबंटन की तारीख से, ऐसी भूमि के संबंध में भूमिस्वामी समझा जावेगा और उन समस्त अधिकारों तथा दायित्‍वों के अध्यधीन होगा, जो इस संहिता के द्वारा या उसके अधीन किसी भूमिस्वामी को प्रदत्त और उस पर अधिरोपित किये गये हैं।

भू राजस्व संहिता के प्रवर्तन में आने की दिनाँक अर्थात् 21.09.1959 से वादग्रस्त संपत्ति को भगवान श्री हनुमान, श्री महाकाली देवी, श्री हनुमान-श्री महाकाली देवी के भूमिस्वामी हक में उक्त उपबंध के आलोक में दर्ज किया गया था।

13- सर्वप्रथम वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार बिहारी लाल ब्राम्हण का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज होना दर्शित है। तत्पश्चात् वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में सर्वराकार के रूप में प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता भुवनलाल गजेन्द्र का नाम दर्ज हुआ। किश्तबंदी खतौनी वर्ष 1980-81 (प्रदर्श पी-6) से वर्ष 2011 तक प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र का नाम किस आधार पर राजस्व अभिलेखों में वादग्रस्त संपत्ति पर स्थित मंदिर के सर्वराकार के रूप में दर्ज हुआ, का कोई स्पष्टीकरण राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं है। किसी भी पक्ष द्वारा वादग्रस्त संपत्ति पर प्रतिवादी क्रमांक 1 के पिता स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र का नाम सर्वराकार के रूप में दर्ज होने के पश्चात् लिखित आपत्ति किसी भी सक्षम कार्यालय में प्रस्तुत किये जाने की कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गई है। तत्पश्चात् दिनाँक 27.09.2012 से वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में विरासतन हक के आधार पर प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम सर्वराकार के रूप में दर्ज हुआ। वादीगण द्वारा यह वाद दिनाँक 21.06.2016 को संस्थित किया गया है। प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के सर्वराकार नियुक्त होने की दिनाँक 27.09.2012 से वाद संस्थित दिनाँक तक किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 1 के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार नियुक्ति को चुनौती दिये जाने संबंधी कोई दस्तावेजी साक्ष्य अभिलेख पर प्रस्तुत नहीं की गई है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में स्वतः कथन कर, प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा स्वयं अपना नाम वादग्रस्त संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में सर्वराकार के रूप में दर्ज करवा लिया जाना प्रकट किया है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 18 में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में दर्ज होने पर, लिखित आपत्ति प्रस्तुत किये जाने का तथ्य स्वीकार करते हुये, एेसी प्रस्तुत आपत्ति की प्रति को प्रकरण में प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 25 में वादग्रस्त संपत्ति पर ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम सर्वराकार के रूप में नामांकित होने की कार्यवाही के विरूद्ध कोई अपील अथवा पुनरीक्षण सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किये जाने के तथ्य को भी स्वीकार किया है। वादीगण के द्वारा ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 का नाम वादग्रस्त संपत्ति पर सर्वराकार के रूप में दर्ज होने को चुनौती नहीं दिये जाने से स्पष्ट है कि वादीगण को ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार होने पर कोई आपत्ति न होकर, मौन सहमति थी।

14- ‘‘सर्वराकार‘‘ से आशय एक-‘‘ऐसे जीवित व्यक्ति, जो धार्मिक स्थापना की व्यवस्था, रखरखाव एवं सुधार स्थापना की निर्मित संरचना को संरक्षित करने के उद्देश्य से नियुक्त हो, से है।‘‘ वर्ष 1929-30 से वर्ष 2015-16 तक के राजस्व अभिलेखों, समस्त वादग्रस्त संपत्ति में स्थित मंदिर के भगवान के नाम पर होना तालिका 2 की अंतर्वस्तु से स्पष्ट है। तालिका 2 के विवरण से सर्वप्रथम बिहारी लाल ब्राम्हण तत्पश्चात् स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र एवं वर्ष 2016 तक ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 के सर्वराकार अर्थात् वादग्रस्त संपत्ति में स्थित भगवान की संपत्ति को संरक्षित एवं संवर्धित करने के उद्देश्य से नियुक्त किये जाने का आशय स्पष्टतः दर्शित है।
15- ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा वादग्रस्त संपत्ति को स्वयं की निजी संपत्ति होने का दावा राजस्व प्रकरण क्रमांक 1बी/113/वर्ष 2014-15 में किया गया है। इस प्रक्रम पर वादग्रस्त संपत्ति के लोक/निजी होने के संबंध में निम्नलिखित परीक्षण अनिवार्य हैः-
तालिका 3
वादग्रस्त संपत्ति के निजी अथवा लोग प्रकृति के संबंध में परीक्षण


16- ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं वादी की ओर से प्रस्तुत वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 04.06.2016 के पृष्ठ क्रमांक 3 में उल्लेखित कंडिका 1 में, स्वयं वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी संपत्ति होना स्वीकार किया है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि में निर्धारित मानदण्ड के आला ेक में अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य से, वादग्रस्त संपत्ति प्रतिवादी क्रमांक 1 की निजी संपत्ति न होकर, लोक प्रकृति की संपत्ति होना प्रमाणित पाया जाता है।

-ःवाद प्रश्‍न 4 एवं 5ः-
17- कौशल तिवारी वासा-3 एवं राजेश तिवारी वासा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 9 में, ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा सर्वराकार की हैसियत से वादग्रस्त संपत्ति को बिना किसी वैधानिक आवश्यकता के व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में, वादग्रस्त संपत्ति का मूल्यांकन लगभग रू0 1,25,51,280/- (एक करोड़ पचीस लाख इक्यावन हजार दो सौ अस्सी रूपये) कर, रमेश मोदी प्रसा-4/प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में अवैध रूप से हस्तांतरित किये जाने का अभिसाक्ष्य दिया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने अपने मुख्य परीक्षण में, स्वयं द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत से प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) निष्पादित किये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। वादीगण की ओर से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा विश्व हिन्दू परिषद के छत्तीसगढ़ प्रांत के प्रदेश अध्यक्ष रमेश मोदी प्रसा-4 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) को अपने साक्ष्य के समर्थन में प्रस्तुत कर, व्यवस्था पत्र को अवैध एवं शून्य घोषित किये जाने के अनुतोष की वांछा की गई है। वादीगण की ओर से ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 को प्रतिपरीक्षण की कंडिका 80 में, स्वयं के सर्वराकार के पद पर पदस्थ होने एवं मंदिर की संपत्ति को अंतरित करने का अधिकार नहीं होने का सुझाव दिये जाने पर ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा असहमति व्यक्त की गई है।

18- ढालेन्द्र राम गजेन्द प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02. 2016 (प्रदर्श पी-8) के माध्यम से क्या व्यवस्था की र्गइ ?
 उक्त तथ्य के परीक्षण हेतु व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाना आवश्यक है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 3 पर, वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी भूमि होना स्वीकार किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने स्वयं व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 4 पर, वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में कंडिका 9 में-‘‘उक्त समस्त भूमि, मकान, मंदिर को विक्रय नहीं किया जा सकता है‘‘, का तथ्य स्वीकार करते हुये, विशिष्ट रूप से उल्लेखित किया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 ने व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के पृष्ठ क्रमांक 1 में उल्लेखित कंडिका 1 में, छत्तीसगढ़ विश्व हिन्दू परिषद के पदेन अध्यक्ष को वादग्रस्त संपत्ति के उत्तरोत्तर विकास व जन कल्याण कार्य की गति तीव्र करने के उद्देश्य से सर्वराकार नियुक्त किये जाने का तथ्य उल्लेखित किया है। संपूर्ण व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में, प्रतिवादी क्रमांक 2 से कोई भी प्रतिफल राशि प्राप्त किये जाने का तथ्य उल्लेखित नहीं है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) में स्वीकृत उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि स्वयं प्रतिवादी क्रमांक 1 ने वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार होने के नाते वादग्रस्त संपत्ति के उत्तरोत्तर विकास के उद्देश्य से, वादग्रस्त संपत्ति को मंदिर की निजी भूमि होना व्यक्त कर, प्रतिवादी क्रमांक 2 को व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के माध्यम से, मात्र सर्वराकार की हैसियत प्रदान कर, वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में आगामी व्यवस्था की है। यदि ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा उक्त व्यवस्था के एवज मे किसी भी प्रकार का अर्थ/प्रतिफल प्राप्त किया जाता, तो ऐसा संव्यवहार हस्तांतरण की परिधि में आता।

19- वादीगण की ओर से प्रस्तुत न्याय दृष्टांत
रामेश्वर दयाल विरूद्ध हरप्रसाद भार्ग व, 
सिविल मिसलेनियस अपील नम्‍बरर 159/1985, 
निर्ण य दिनाँक 09.11.1986 
प्रस्तुत कर, तर्क दिया गया है कि ‘‘सेवायत-अधिकार, किसी अन्य के पक्ष में नहीं छोड़ा जा सकता- ऐसे अधिकार का संपत्ति पर भी निश्चित् प्रभाव होता है-अधिकार विनिश्चित् किया जाना चाहिये।‘‘
विचार विमर्श ः- उक्त न्याय दृष्टांत का पूर्ण परिशीलन किये जाने से दर्शित है कि न्याय दृष्टांत में उभयपक्ष के मध्य माध्यस्थम करार था और ऐसे माध्यस्थम करार के परिप्रेक्ष्य में माननीय विचारण न्यायालय द्वारा सर्वराकार के अधिकार के प्रश्न पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है। विचारण न्यायालय के निष्कर्ष को माननीय अवर न्यायालय द्वारा पुष्टि की गई है। संस्थित वाद में उभयपक्ष के मध्य कोई माध्यस्थम करार का अस्तित्व दर्शित नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में माध्यस्थम करार के माध्यम से सर्वराकार के अधिकार के निर्धारण बाबत् न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि पर इस वाद में विश्वास व्यक्त करते हुये, लागू नहीं किया जा सकता है। अतः उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि का र्कोइ लाभ वादीगण को प्राप्त नहीं होता है।
वादीगण की ओर से एक अन्य न्याय दृष्टांत

काली किंकोर गांगुली विरूद्ध पन्ना बैनर्जी एवं अन्य, 
व्यवहार अपील क्रमांक 1115/1973, निर्ण य दिनाँक 16.08.1974,र् 
ए.आइ .आर. 1974, सुप्रीम कोर्ट 1932 प्रस्तुत कर, सर्वराकार के अधिकार को अंतरित नहीं किये जाने का तर्क प्रस्तुत किया गया है।
प्रतिपादित विधिः-सह सर्वराकार द्वारा अजनबी के पक्ष में सर्वराकार की अधिकारिता में स्वयं के आधे अंश को मंदिर एवं संपत्ति को विक्रय विल ेख के माध्यम से अंतरित किया जाना अवैध एवं शून्य माना गया। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि मंदिर/देवता/सर्वराकार के अधिकार आर्थिक प्रतिफल के लिये अंतरित नहीं किये जा सकते हैं।

विचार विमर्श ः- संस्थित वाद में ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) के निष्पादन के समय वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की हैसियत रखी जाती थी। इसके विपरीत व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08. 02.2016 (प्रदर्श पी-8) की अंतर्वस्तु से स्पष्टतः दर्शित है कि सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा वादग्रस्त संपत्ति में सर्वराकार की व्यवस्था करने में कोई आर्थिक प्रतिफल प्राप्त नहीं किया है। अतः संस्थित वाद में वादीगण की ओर से प्रस्तुत उक्त न्याय दृष्टांत में प्रतिपादित विधि प्रवर्तित नहीं होती है।
संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति की वैधानिक प्रास्थिति के संबंध में प्रतिवादीगण द्वारा कौशल तिवारी वासा-3 को प्रतिपरीक्षण में सुझाव दिये जाने पर साक्षी द्वारा वादी क्रमांक 1 समिति के पंजीकृत/अपंजीकृत होने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया गया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में साक्ष्य दिनाँक तक वादी क्रमांक 1 आनंद मठ मंदिर समिति कौही के पंजीकृत नहीं होने का तथ्य स्वीकार किया है। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 14 में स्वयं की प्रास्थिति वादी क्रमांक 1 समिति के कोषाध्यक्ष होने के संबंध में घोषणा का आधार पूछे जाने पर, ग्राम कौही के पुराने सदस्यों द्वारा स्वयं कौशल तिवारी वासा-3 को आनंद मठ मंदिर समिति का उपाध्यक्ष घोषित किये जाने का तथ्य प्रकट किया है। कौशल तिवारी वासा-3 अपने प्रतिपरीक्षण में, स्वयं को वादी क्रमांक 1 समिति के उपाध्यक्ष घोषित करने वाले ग्राम कौही के ऐसे कथित किसी पुराने सदस्य का नाम प्रकट करने में असफल रहे हैं। वादी क्रमांक 1 समिति का सर्वप्रथम गठन किन पदाधिकारी एवं सदस्‍यों को समाहित कर, किया गया, का कोई प्रमाण वादीगण की ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया है। ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 द्वारा ‘‘वादी क्रमांक 1 समिति के सदस्यगण का हर 6 माह में बदलते रहने‘‘ का तथ्य स्वतः कथन करते हुये, अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 64 में प्रकट किया गया है।

प्रतिवादीगण द्वारा स्वयं के अभिवचनों में वादी क्रमांक 1 समिति को अस्थायी समिति होना उल्लेखित करते हुये, समर्थनकारी साक्ष्य प्रकट की गई है। इसके विपरीत वादी क्रमांक 1 समिति के वैधानिक अस्तित्व के संबंध में वादीगण पर प्रमाण प्रस्तुत किये जाने का प्रमाण भार था। कौशल तिवारी वासा-3 ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 16 में वादग्रस्त संपत्ति की देखरेख एवं व्यवस्था की दीर्धकालीन सतत् जिम्मेदारी वादी क्रमांक 1 समिति पर होने के संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये जाने का तथ्य स्वीकार किया है।
अस्तित्वाधीन परिस्थितियों में वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की नियुक्ति समिति के पदाधिकारियों व सदस्‍यों की सहमति से होने संबंधी नियम-विनियम का भी अस्तित्व दर्शित नहीं है।

ए.आइ .आर. 1916 मद्रास 475 (477) डी.बी
प्रतिपादित विधिः-‘‘मंदिर समिति द्वारा इस बाबत् घोषणा वाद कि ‘‘वादग्रस्त मंदिर समिति के नियंत्रण में होकर, समिति द्वारा नियुक्त व्यवस्थापक द्वारा ही प्रबंधित होना चाहिये।‘‘ ऐसी परिस्थितियों में समिति को व्यवस्थापक की नियुक्ति का अधिकार स्वयं में निहित होकर, प्रमाणित करना आवश्यक है।

विचार विमर्श ः- संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति की वैधानिक पंजीकृत प्रास्थिति, समिति के नियम-उप नियम ही सृजित/निर्धारित नहीं है। साथ ही स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के सर्वराकार की हैसियत से वादी क्रमांक 1 समिति नेा अपने आचरण से दोनों ही सर्वराकार की नियुक्ति दिनाँक से किसी भी प्रकार से चुनौती न देकर, मौन रूप से स्वीकृति दी है। ऐसी स्थिति में संस्थित वाद में समिति की वैधानिक नींव व स्वयं द्वारा संपादित कार्यप्रणाली नियम-विनियम के सृजन की शक्ति के अभाव में, वादी क्रमांक 1 समिति का वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार की नियुक्ति का स्वयं के नियंत्रण में होने की दलील स्वीकार्य योग्य नहीं है।
संस्थित वाद में वादी क्रमांक 1 समिति के सृजित नियम-विनियम नहीं होने से, यह नहीं कहा जा सकता कि वादी क्रमांक 1 समिति को ही वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार नियुक्त करने का अधिकार था। शासकीय अधिकार अभिलेखों में भी उक्त दोनों को सर्वराकार बनने को भी किसी सरकार द्वारा आपत्ति नहीं कर, दोनों सर्वराकार अर्थात् स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र का नाम नियमानुसार इंद्राज है। वादी क्रमांक 1 समिति द्वारा स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र को वादग्रस्त संपत्ति का सर्वराकार स्वयं के आचरण से स्वीकार किया गया था। इसलिये स्व. श्री भुवनलाल गजेन्द्र व ढालेन्द्र राम गजेन्द्र के वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार बनने को कोई चुनौती यथासमय किसी सक्षम फोरम में नहीं दी। उक्त परिस्थितियों में वादी क्रमांक 1 समिति वादग्रस्त संपत्ति के प्रतिनिधित्व व संपत्तियों की मांग करने का अधिकार नहीं रखती है।

संस्थित वाद में उपलब्ध साक्ष्य की उपबंधित विधि के आलोक में उक्तानुसार विवेचना से वादग्रस्त संपत्ति के सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र को वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) निष्पादित करने का अधिकारी नहीं होना नहीं कहा जा सकता है। फलतः प्रतिवादी क्रमांक 1 ढालेन्द्र राम गजेन्द्र द्वारा प्रतिवादी क्रमांक 2 के पक्ष में निष्पादित व्यवस्था पत्र दिनाँकित 08.02.2016 (प्रदर्श पी-8) अवैध/शून्य होना दर्शित नहीं है।

-ःवाद-प्रश्‍न क्रमांक 6ः-
20- वाद प्रश्न क्रमांक 3 की साक्ष्य विवचेना से, वादग्रस्त संपत्ति सर्वराकार ढालेन्द्र राम गजेन्द्र प्रसा-1 की निजी संपत्ति होना प्रमाणित नहीं हुआ है। वादग्रस्त संपत्ति मंदिर में विराजित भगवान की संपत्ति पाई गई है। ऐसी परिस्थितियों में वादी क्रमांक 1 समिति वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में स्थायी निषेधाज्ञा का अनुतोष प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

-ःवाद-प्रश्‍न क्रमांक 7ः- 
21- वाद-प्रश्न क्रमांक 1 से 6 की साक्ष्य विवेचना से, संस्थित व्यवहार वाद में निम्नवत् आशय की डिक्री पारित की जाती हैः- 1- वादीगण का वाद निरस्त किया जाता है। 2- उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे। 3- अधिवक्ता शुल्क नियमानुसार देय हो।
निर्णय आज दिनाँकित, हस्ताक्षरित मेरे निर्देशानुसार निर्णय कर, घोषित किया गया।
(कु. स्मिता रत्नावत) 
नवम अपर जिला न्यायाधीश, दुर्ग (छ.ग.)

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