Friday, 21 October 2016

भ्रष्टाचार रोकने के कानून

 

(भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988)
भ्रष्ट लोक सेवक समाज की कोढ़ में खाद:-
जनतांत्रिक शासन प्रणाली में किसी भी व्यवस्था के संचालन का दायित्व लोक सेवकों पर होता है। यदि लोक सेवक भ्रष्ट हो जाए तो राष्ट्र की जड़ें कमजोर हो जाती है। इसका असर राष्ट्र के विकास पर पड़ता है। लोक सेवक ठीक ईमानदारीपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें और भ्रष्टाचार को रोका जा सके, इसलिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 का सृजन किया गया है।
लोक सेवक कौन है ?
प्राप्त लोक सेवक से सरकारी सेवक का बोध होता है, किंतु लोक सेवक का दायरा इससे बड़ा है। लोक सेवक के अंतर्गत सरकारी सेवक के अलावा वो सभी व्यक्ति आते हैं, जो ऐसे किसी पद पर आसीन हैं, जिसके आधार वे किसी लोक कर्तव्य का पालन करने के लिए प्राधिकृत हैं। जैसे गांव का प्रधान, एम.एल.ए., एम.पी. न्यायालय द्वारा नियुक्त वकील आदि भी लोक सेवक हैं। अतः इस अधिनियम में ऐसे सभी व्यक्ति आते हैं, जो लोक कर्तव्य प्रकृति के पद पर हैं और उन्हें लोक कर्तव्य का पालन करने के लिए अपेक्षित या प्राधिकृत किया गया है।
भ्रष्टाचार का अर्थ:-
प्रायः भ्रष्टाचार का मतलब घूस या रिश्वत लेना समझा जाता है, किंतु इस अधिनियम की धारा-7 में की गई परिभाषा के अनुसार यदि कोई परितोषण या ईनाम अपने पदेन कार्य में अपने पदीय कृत्यों के प्रयोग में अनुग्रह दिखाने के लिए लेना, यदि किसी लोक सेवक के द्वारा ईनाम परितोषण के लिए अपने पद का दुरूपयोग किया जाता है, जो भ्रष्टाचार माना जायेगा इसके लिए कारावास की सजा दी जा सकती है।
इस अधिनियम की धारा-13 के तहत लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेने को आपराधिक अनाचार के अंतर्गत माना गया है, जिसके लिए एक वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक कारावास की सजा हो सकती है तथा अर्थदंड से भी दंडित किया जाएगा। अतः रिश्वत लेने पर धारा-7 के अलावा धारा-13 में भी लोक सेवक को भ्रष्टाचार के लिए दायित्व किया जाता है।
रिश्वत देने के लिए भी दण्ड का प्रावधान:-
रिश्वत लेना ही नहीं, बल्कि रिश्वत देना भी दंडनीय अपराध है। यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक को रिश्वत देता है या लोक सेवक को भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा पदेन कृत्य अनुग्रह करने के लिए उत्प्रेरित करता है तो ऐसे रिश्वत देकर लोक सेवक को गुमराह करने वाले व्यक्ति को इस अधिनियम की धारा-6 के अंतर्गत 6 माह से लेकर 5 वर्ष तक के कारावास की सजा से दंडित किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी उच्च पद पर आसीन हो और अपने व्यक्तिगत प्रभाव से किसी लोक सेवक को उत्प्रेरित करने के लिए या ईनाम के लिए प्रतिग्रहित करते हुए अपने पद के दुरूपयोग से लोक सेवक के पदेन कृत्यों में अनुग्रह करने के लिए कहता है या उस पर प्रभाव डालकर परितोषण के लिए उत्प्रेरित करता है तो उस व्यक्ति को इस अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत 6 माह से लेकर 5 वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है तथा जुर्माने से भी दंडित किया जाएगा।
भ्रष्ट लोक सेवक को रंगे हाथों पकड़ने वाली प्रक्रिया:-
रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले दोनों को यदि देने या लेने पर कोई एतराज नहीं हो तो यह प्रक्रिया चलती रहती है। भ्रष्ट लोक सेवक को पकड़ना मुश्किल हो जाता है। इसलिए जब लोक सेवक रिश्वत की मांग करता हो और दूसरा व्यक्ति रिश्वत देने को तैयार न हो तभी किसी लोक सेवक को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ना संभव होता है।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोध एक अलग विभाग भी बनाया गया है, जिसका कार्य संबंधित व्यक्ति के संबंध में कोई शिकायत मिलने पर विभाग द्वारा उसे पकड़ने के उपाय किए जाते हैं। अधिनियम की धारा-17 के प्रावधान के अनुसार किसी लोक सेवक के द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत गोपनीय ढंग से की जाती है, जिस पर विशेष पुलिस अधिकारी उक्त लोक सेवक को रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाता है। शिकायतकर्ता को रिश्वत देने की धनराशि के नोटों पर फिलैथीन पाउडर लगाया जाता है या हस्ताक्षर भी किया जाता है। ये नोट जब भ्रष्ट अधिकारी हाथ से स्पर्श करते हैं और हाथ पानी में डालते हैं तो पाउडर लगने के कारण हाथ लाल हो जाता है। इस तरह सबूत के साथ भ्रष्ट लोक सेवक को पकड़ना संभव होता है।
रंगे हाथों पकड़े बिना भ्रष्ट सेवक को दंडित करने की प्रक्रिया:-
प्रायः रिश्वत लेने वाले सेवक कानूनी दावपेंचों को जानते हैं और वे पकड़े जाने के उपाय ढूंढ लेते हैं। वे रिश्वत रूपये में न लेकर भिन्न-भिन्न रूपों में लेते हैं। ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा-13 के अंतर्गत लोक सेवक को भ्रष्टाचार में लिप्त होने के लिए पकड़ने की व्यवस्था है। 
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 के अंतर्गत कोई लोक सेवक भ्रष्ट समझा जाता है-
(क) यदि वह अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिए वैध पारिश्रमिक से भिन्न कोई ईनाम प्राप्त करता है।
(ख) यदि वह अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई मूल्यवान वस्तु प्रतिफल के रूप में प्राप्त करता है या सहमत होता है। इसमें अन्य व्यक्ति में उसका नातेदार या जिसके साथ उसका हित संबंध हो जाता है।
(ग) यदि वह लोक सेवक के रूप में अपने को सौंपी गई किसी संपत्ति का अपने उपयोग के लिए अवैध तरीके से दुर्विनियोग करता है या अन्य व्यक्ति को करने के लिए देता है।
(घ) यदि वह भ्रष्ट या अवैध साधनों से अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई मूल्यवान वस्तु या धन संबंधी लाभ अभिप्राप्त करता है अथवा यदि उसके या उसकी ओर से किसी व्यक्ति के पास आय के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक धन है, जिसका वह लेखा जोखा नहीं दे सकता।
दण्ड:- उपरोक्त अपराध में आरोप सिद्ध सजा होने पर एक वर्ष से सात वर्ष तक के कारावास तक की सजा हो सकती है और अर्थदंड से भी दंडित किया जा सकता है।
केंद्रीय सरकार के लोक सेवकों पर सी.बी.आई. द्वारा कार्यवाही:
केंद्र सरकार के लोक सेवकों पर कार्यवाही करने के लिए सी.बी.आई. की विशेष पुलिस ही प्राधिकृत है। चूंकि प्रत्येक जिला से सी.बी.आई. कार्यालय नहीं होता है, इसलिए जहां इसका कार्यालय हो, वहां इसकी गुप्त सूचना दी जाती है।
 बैंक बीमा कंपनी तथा केंद्र सरकार के उपक्रमों के कर्मचारी भी केंद्रीय लोक सेवक के दायरे में आते हैं,इसलिए इन पर कार्यवाही करने का दायित्व सी.बी.आई. के विशेष बल का है।
अपने पद का दुरूपयोग करके किसी व्यक्ति द्वारा ईमानदार लोक सेवक के नाम पर रिश्वत लेना अपराध है। ऐसे अपराध के लिए इस अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत 6 माह से लेकर 5 वर्ष तक कारावास एवं अर्थदंड का प्रावधान है।
इस अधिनियम के द्वारा ईमानदार लोक सेवक की रक्षा भी होती है। किसी लोक सेवक के विरूद्ध भ्रष्टाचार का मुकदमा न्यायालय में तभी चल सकता है, जब ऐसे लोक सेवक के विभागाध्यक्ष द्वारा इस अधिनियम की धारा-19 के तहत अनुमति प्रदान की जाती है। अतः ईमानदार लोक सेवक पर झूठा आरोप लगाने की दशा में उसके विभागाध्यक्ष के द्वारा उसकी रक्षा की जाती है।
भ्रष्टाचार के मामलों का क्षेत्राधिकार केवल विशेष न्यायाधीश का है -
इस अधिनियम की धारा-4 के अंतर्गत सेशन जज या विशेष न्यायाधीश के पास ही ऐसे मामलों की सुनवाई की जाती है।
लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेने संबंधी कुछ मामले एवं उनका निर्णय:-
1. स्वरूपचंद्र बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1987 सी.पी. 144, इस मामले का अभियुक्त राजस्व पटवारी था, जिसमें जमाबंदी की प्रतिलिपियां उपलब्ध कराने हेतु परिवादी से 200/- रूपये रिश्वत मांगी थी। परिवादी ने इसकी शिकायत पुलिस से की और योजना बनाकर अभियुक्त को रंगे हाथों पकड़ते हुए उसके कोट की जेब से 200/- रूपये रिश्वत बरामद किए गए। अभियुक्त अपने कोट में पाए गए 200/- रू. को कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सका और उसको इस अपराध से दण्डित किया गया ।
2. सखाराम गंगाराम ठाकरे बनाम महाराष्ट्र राज्य 1990 (2) क्राइम (111) इस मामले में अभियुक्त ने परिवादी के हक में निर्णय देने के लिए 1000/- रू. की रिश्वत की मांग की थी और जाल में फंसाने के बाद अभियुक्त के कोट की जेब से रिश्वत की धनराशि बरामद की गई। इस प्रकार अभियुक्त को भ्रष्टाचार के आरोप में दंडित किया गया ।
3. रामनारायण पिल्लई बनाम तमिलनाडू राज्य 1973 क्रि.एल.जे.-1303, इस मामले में नगरपालिका के इंस्पेक्टर ने इस बात के लिए रिश्वत की मांग की थी कि वह परिवादी के मकान पर हाऊस टेक्स नहीं बढ़ाएगा और उसके विरूद्ध रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने का आरोप सिद्ध होने पर अभियुक्त को दंडित किया गया।
4. बसंत मारूती बैंकर बनाम महाराष्ट्रा राज्य 1991 सि.ए.ग.-3163, इस मामले में मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवादी के मुकदमे की सुनवाई चल रही थी, जो निर्णय के अधीन था। इसमें अभियुक्त के वकील ने अभियुक्त से मजिस्ट्रेट के नाम 5000/- रूपये लिए और कहा कि मजिस्ट्रेट को ये रूपये देने पर उसे मुकदमे से बरी कर दिया जाएगा। अभियुक्त ने इसकी शिकायत मजिस्ट्रेट से की और वकील को भ्रष्टाचार के अंतर्गत दंडित किया गया।
5. तंगराजू बनाम तमिलनाडू राज्य 2002, क्रि.एल.जे. 7189 - परिवादी को अपने खेत संबंधी दस्तावेज की प्रति की जरूरत थी, जिसके लिए गांव के प्रशासनिक अधिकारी उससे 200/- रूपये की रिश्वत मांग की थी। परिवादी ने 50/- रूपये तुरंत दे दिए और बकाया राशि बाद में देने की बात कही। इस बीच परिवादी ने विजलेंस अधिकारी को इसकी सूचना दे दी। विजिलेंस अधिकारी को इसकी सूचना दे दी। विजिलेंस अधिकारी ने योजना बनाकर अभियुक्त को 200/- रूपये दिलवाये और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। इस प्रकार अभियुक्त को इस परिवाद में
दंडित किया गया। 
6. हनुमंत राम बनाम आंध्रप्रदेश राज्य 1993 एम.सी.सी.-177, इस मामले में पुलिस सब इंस्पेक्टर ने 50,000/- रूपये की रिश्वत शराब के ठेकेदार से इसलिए मांग की थी कि वह बिना चैक किए उसका अदक को न तो पकड़ेगा और न ही डिपो को चैक करेगा, जिस पर पुलिस इंस्पेक्टर को 50,000/- रूपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया और भ्रष्टाचार के अपराध में दंडित किया गया ।
भ्रष्टाचार कोई लाईलाज बीमारी नहीं है। यदि हम अपनी सुविधा और सहुलियत के लिए अनैतिक मार्ग का उपयोग न करें और भ्रष्ट लोक सेवक एवं अधिकारियों के विरूद्ध कमर कस लें तो निश्चय ही यह बीमारी समाज से दूर हो जाएगा।
रिश्वत लेना और लेना दोनों अपराध है।
रिश्वत देने और लेने वाले दोनों सजा के भागी हैं।

2 comments:
Write comments
  1. सर मेरे एक परिचित इंस्पेक्टर है उनको करप्शन के मामले में पांच साल की सजा हुई है परंतु राशि उनके हाथो से प्राप्त नही हुई है बल्कि उनके बिस्तर के नीचे से मिले है कृपया सलाह प्रदान करे।

    ReplyDelete
  2. sir give me your mobile number

    ReplyDelete

महत्वपूर्ण सूचना- इस ब्लॉग में उपलब्ध जिला न्यायालयों के न्याय निर्णय https://services.ecourts.gov.in से ली गई है। पीडीएफ रूप में उपलब्ध निर्णयों को रूपांतरित कर टेक्स्ट डेटा बनाने में पूरी सावधानी बरती गई है, फिर भी ब्लॉग मॉडरेटर पाठकों से यह अनुरोध करता है कि इस ब्लॉग में प्रकाशित न्याय निर्णयों की मूल प्रति को ही संदर्भ के रूप में स्वीकार करें। यहां उपलब्ध समस्त सामग्री बहुजन हिताय के उद्देश्य से ज्ञान के प्रसार हेतु प्रकाशित किया गया है जिसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है।
इस ब्लॉग की सामग्री का किसी भी कानूनी उद्देश्यों के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हमने सामग्री की सटीकता, पूर्णता, उपयोगिता या अन्यथा के संबंध में कोई ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। उपयोगकर्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी पर कार्य करने से पहले किसी भी जानकारी को सत्यापित / जांचें और किसी भी उचित पेशेवर से सलाह प्राप्त करें।

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Aanand Math Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Ajeet Kumar Rajbhanu Anticipatory bail Arun Thakur Awdhesh Singh Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara Durg H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH Kauhi Lalit Joshi Mandir Trust Motor accident claim News Patan Rajkumar Rastogi Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Sarvarakar SC Shayara Bano Smita Ratnavat Temporary injunction Varsha Dongre VHP अजीत कुमार राजभानू अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दिलीप सुखदेव दुर्ग न्‍यायालय देवा देवांगन नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रफुल्ल सोनवानी प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर रेवा खरे श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा स्मिता रत्नावत हरे कृष्ण तिवारी